Thursday, 15 June 2017

वास्तु और पुरुषार्थ चतुष्ठय

आजकाल वास्तु की चर्चा काफी ज्यादा हो रहा है। लोगो वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करना पसंद करते है। वास्तु की पुस्तक की पुस्तक दुकानो पर काफी ज्यादा उपलब्ध हो रहा है। गणमाध्यम चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक हो या समाचार पत्र वास्तु के ऊपर चर्चा हो रहा है। ऐसा लग रहा है हम वास्तु युग मे आ चुके है। 

प्रश्न उठता है वास्तु का अर्थ क्या है ? और उसका मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है ? मैने कुछ लोगों को पूछा वास्तु कहने से आप क्या समझ ते है ? उनका जो उत्तर था वो इस तरहा से था गृह के वस्तुओं को दिशा के अनुसार रखना या कोई दीवार को तोड़फोड़ करना या कोई यन्त्र दीवारों पर लगाना आदि को वास्तु कहते है। क्या सच्च मे इसको वास्तु कहते है ! इसको वास्तु नहीं कहते। हाँ इतना जरूर कहूँगा वास्तु के नाम ज्योतिषियों ने लोगो की मन मे भय की सृस्टि करके रुपया कमाने का अच्छा उपाय कर रखे है। जवतक हम वास्तु क्या है इसका सही जानकारी ना हो जाए और वास्तु का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, इसकी सही जानकारी ना हो जाए, तवतक हम इस वास्तु रूपी अन्धकूप मे पड़े रहेंगे।

वास्तु शब्द संस्कृत भाषा से आया है। संस्कृत भाषा मे वास्तु शब्द का अर्थ है वसन्ती प्राणीनो यत्र  अर्थात जहाँ प्राणि निवास करते है उसको वास्तु कहते है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार वास्तु शब्द इस तरह तैयार हुआ है, वस निवासे + वसेरगारे णिच्च (उणादि कोष १, ७० )। अर्थात वस धातु के सा णिच्च प्रत्यय से वास्तु शव्द का उत्त्पन होता है।

वास्तु शव्द का अर्थ अन्य पुस्तको मे किया लिखा है विचार करते है। हलायुध कोष के अनुसार वास्तु कहने से इस प्रकार लिखा है "वास्तु संक्षेपतो वक्ष्य गृहबे विघ्ननाशानं। ईशानकोणादरभ्य हयोका शीतिपदे त्यजेत्  " अर्थात वास्तु संक्षेप मे ईशान्यादि कोण से प्रारंभ होकर गृह निर्माण का वो कला है जो गृह का विघ्न - प्राकृतिक उत्पातो -उपद्रवो से वचता है। वास्तुविश्वकोष मे वास्तु का अर्थ है "यह ग्राम, पुर, द्रुग, पत्तन, पुरभेद, आवास भवन और निवास भूमि का वाचक है। " इसप्रकार अमरकोष वास्तु शब्द का अर्थ है " गृहरचना विच्छिन्न भूमे " अर्थात गृह रचना के लिये अविच्छन्न भूमि को वास्तु कहते है।

किन्तु मेरा मत है वास्तु एक ऐसा गाणितिक विज्ञान का प्रयोगात्मक रूप है, जो मन्युष्य को निवास स्थल मे त्रिविध दुःख अर्थात आध्यात्मिक दुःख, आधिभौतिक दुःख और आधिदैविक दुःख को निवारण के लिये और पुरुषार्थ चतुर्वर्ग अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त के लिये एक माध्यम है।

वास्तुशास्त्र को कुछ लोक स्थापत्य शास्त्र कहते है तो कुछ लोक शिल्प शास्त्र कहते है। मेरा मत है वास्तुशास्त्र को स्थापत्य शास्त्र तो कह सकते है किन्तु शिल्प शास्त्र नहीं कह सकते। क्युकि वास्तुशास्त्र शिल्प शास्त्र का एक अंग है। फिर कभी शिल्प शास्त्र क्या है इस का वर्णन करेंगे।

आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति जिसे इंग्लिश मे आर्किटेक्चर और प्राचीन भवन निर्माण पद्धति को वास्तुशास्त्र कहते है। यह दोनों एक जैसा होकर भी दो अलग अलग विषय है। आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति के अनुसार कैसे उत्तम गृह का निर्माण किया जा सकता है वो किसि भी भवन निर्माणकरि (आर्किटेक्ट) कह सकता है, किन्तु वहा जो निवास करेगा वो आनंद मे रहेगा उसका प्रमाण दे नही सकता। किन्तु एक प्राचीन भवन निर्माणकरि (वास्तुशास्त्री ) कह सकता है की यहाँ जो निवास करेगा वो सुख मे रहे पायेगा या नहीं। यदि हम वास्तु शास्त्र का मूल सिद्धान्त को लेकर आधुनिक भवन निर्माण कला के मिलाकर भवन निर्माण करते है तो हम एक सुखी जीवन पा सकते है। और यदि हम भवन निर्माणकला से वास्तु विज्ञान को निकाल दिया जाये तो हम ईट, पथर, लोहा, सीमेन्ट आदि का एक सुव्यवस्थित सुंदर आकर वस्तु ही निर्माण होगा किन्तु उसे एक गृह के रूप मे विवेचिन नहीं हो पाएगा। कारण गृह किसीको कहते है उसका सुन्दर वर्णन
वृहदवास्तुमाला मे लिखा है।

स्त्रीपुत्रादिकभोगसौख्यजननं धर्मार्थाकामप्रदम्।
जन्तुनामयनं सुखास्पादमिदं शीतामवुघर्मापहम। (४ )

स्त्रीपुत्र आदि का भोग, सुख, धर्म, अर्थ, काम को प्रदान करनेवाला , प्राणियों को सुख का स्थान और शीत, वायु, गरम अदि कष्ट से रक्षा करने वाला गृह है।

संसारमे जितने भी प्राचीन मानव सभ्यताए है प्राय सभी गृह निर्माणको एक सांसारिक कृत्य के रूप मे मानते है किन्तु भारत मे गृह निर्माणको एक धार्मिक कृत्य के रूप मे मानते है। उस का क्या कारण है ? क्यूँ के हमारे ऋषियों का यह मानना है, जहा मनुष्य रहेगा वहा अपनी निवास स्थान पर पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करेगा। जब तक हम इस धार्मिक तत्त्वका मूल रहस्य विन्दु तत्त्वको नहीं समझ पायेंगे, तबतक हम वास्तुशास्त्र का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, हम ठीक से समझ नहीं पाएंगे।

अव प्रश्न उठता है पुरुषार्थ चतुष्ठयका वास्तु के साथ क्या सम्पर्क है ? उसका वर्णन हम यहाँ करेंगे।

१. धर्म :- धर्म क्या है ?
आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का प्रथम सूत्र मे लिखा है

सुखस्य मूलं धर्म : ।(चाणक्यसूत्र १। १ )

अर्थात किसी भी व्यक्ति या समाज का सुख का मूल धर्म है। तो धर्म क्या है ? संस्कृत मे धर्म की व्याख्या इस तरहा किया जाता है धरणात् धर्म इत्याहु : या ध्रीयते अनेने लोक : इत्यादि के अनुसार जिसे आत्मोन्नति और उत्तम सुख को धारण किया जाता है वह धर्म है अथवा जिसके द्वारा समस्त लोक को धारण किया जाता है अर्थात व्यवस्था या मर्यादा मे रखा जाता है वह धर्म है। हम इसको इस तरहा कह सकते है आत्माका उन्नति करने वाला, मोक्ष और उत्तम व्यावहारिक सुखों को देनेवाला आचरण, कर्त्तव्य, अथवा श्रेष्ठ विधान या नियम को धर्म कहते है। स्थूल रूप मे हम धर्म को दो भागो मे भाग किया जा सकता है।
i . मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थमे )
ii . गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे )

i. मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थ मे) : आध्यात्मिक अर्थ मे आत्मा का उपकारक, मोक्षको प्राप्त करनेवाला आचरण को धर्म कहा जाता है।  यह धर्म का मुख्य अर्थ है।

ii. गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे) : लौकिक अर्थमे या व्यावहारिक क्षेत्रमे मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति करने वाला, मानवत्व और देवत्व का विकास करने वाला, उत्तम सुख को प्रदान करने वाला और श्रेष्ठ व्यावहारिक कर्त्तव्य, मर्यादा और विधान को धर्म कहा जाता है। यह लौकिक अर्थ मे होने के कारण देश काल और परिस्थिति के अनुसार इस का अर्थ वदल जाता है।

तो धर्म के साथ वास्तु का संपर्क है ?

धर्म जिसका वर्णन हम उप्पर कर चुके है चाहे मुख्य रूप मे हो या गौण रूप मे प्रत्यक्ष्य या परोक्ष्य रूप मे गृह और समाज के ऊपर निर्भर करता है। इसको हम ऐसे कह सकते है वास्तु के ऊपर निर्भर करता है। जहाँ मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति होने मे काफी सहायता मिलता है। इसलिए यदि गृह निर्माण के वाद कर्त्ता और उसके परिवार का उन्नति नहीं हुआ तो गृह निर्माण करने का क्या प्रयोजन ?

२. अर्थ :- प्रथम हम अर्थ क्या है यह समझते है।

आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र मे लिखा है

धर्मस्य  मूलं  अर्थ :   (चाणक्यसूत्र १।२ )

अर्थात धर्म का मूल अर्थ है। यदि किसी व्यक्ति या समाज के पास अर्थ अर्थात धन नहीं है तो वो व्यक्ति या समाज धर्म का उपार्जन नहीं कर सकता। अर्थ का एक ही प्रमाण यहाँ लिख रहा हूँ, इसका कारण है की प्राय सभी धन के विषय मे परिचित है। पंचतन्त्र मे लिखा है

यस्यार्थास्तुस्य मित्राणि, यस्यार्थास्तुस्य बान्धवा : ।
यस्यार्था: स पुमाल्लोके, यस्यार्था: स च पण्डित : । (१ / ३ )

अर्थात धनवान पुरुषको सभी मित्रता करना चाहता है। धन अगर पास है तो परिवार और स्वजन लोगो आत्मीयता प्रदर्शन करते है। धनवान पुरुष समाज मे उत्तम पुरुष के रूप मे गणना होता है। और धन के द्वारा वो समाज मे विद्वान के रूप मे जाना जाता है।

इसतरहा बहुत सारे उदाहरण है किन्तु लिखना सिर्फ कागज भरनी की सामान है। इसलिए मे ज्यादा नहीं लिख रहा हू।

अगर किसी भी गृहस्थ उसका गृह निर्माण करने के वाद उसका परिवार का प्रत्येक व्यक्ति का अर्थ मे वृद्धि नहीं हुआ तो गृह निर्माण का क्या लाभ ? इसलिए गृह निर्माण करने के वाद गृहकर्त्ता का अर्थ मे वृद्धि होना अत्यंत आवश्यक है। यही वास्तु का अर्थ का साथ सम्पर्क है।

३. काम:- मे काम के वारे मे ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा। किन्तु इतना लिखूंगा यहाँ काम का मतलव यौन सुख से है।

गृह निर्माण के वाद गृहपति या गृहपत्नी को पूर्ण दाम्पत्य सुखका प्राप्त होना चाहिए। पुत्र -पौत्र आदि से गृह बृद्धि होना चाहिए। अगर गृह निर्माण के वाद परिवार मे कलह, मानसिक चिन्ता या परिवार मे सुख का अभाव होता है तो गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ काम का सम्पर्क है।

४. मोक्ष :-  महाराज मनु ने अपनी मनुस्मृति मे लिखा है

वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियणां च संयम : ।
धर्मक्रियात्मा चिन्ता च नि:श्रेयसकर परम ।

अर्थात वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इद्रिया संयम, धर्म का पालन, और परमात्मा का ज्ञान और ध्यान यह मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वोत्तम कर्म है।

इसलिए गृह निर्माण करने पर गृहपति और इसके परिवार को मृत्यु के वाद मोक्ष को और थोड़ा अग्रसर नहीं हुआ और परजन्म मे इस जन्म से अच्छा नहीं हुआ तो भी गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ मोक्ष का सम्पर्क है।

इसतरहा मैने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संक्षप परिचय किया है फिर कभी में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तृत वर्णन करूँगा।

इसलिए एक समाज या व्यक्ति के लिए वास्तुशास्त्र का क्या लाभ उसका उत्तर विश्वकर्मावास्तुशास्त्र मे लिखा है।

शास्तेणानेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम् ।
चतुर्वर्गफल प्राप्तिस्सल्लोकश्च भवेद् ध्रुवम् ।। ( १ /३० )
शिल्पशास्त्र परिज्ञाना  न्यर्त्ये पी  सुरमं भवेत् । (१ / ३१ )

अर्थात समस्त लोकोमे विभिन्न शास्त्र का लख्य है, परम सुख को प्राप्त करना। इहलोकमे पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करना। और सत्यलोक मे अनंत काल तक आनंद मे रहना। इस शिल्पशास्त्र को जानने वाला इहकाल मे पृथिवी मे देवत्व को प्राप्त करने के कारण वो सम्पूर्ण समाज का कल्याण करने के लिए हमेशा उद्यम करता रहता है,  इसलिए वो भूलोक में  देवता तुल्य हो जाता है। मृत्यु के वाद उस शिल्पी का शिल्प उसको अमरत्व ले आता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. मनुस्मृति : मनु, भाष्यकार डॉ. सुरेन्द्रकुमार, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  2. पञ्चतन्त्र: श्रीविष्णुशर्मा प्रणीत, व्याख्याकार श्री श्यामचरण पाण्डेय, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, संस्करण २००६ ई।
  3. बृहद वास्तुमाला: श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी संस्करण २०१४ ई।
  4. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ भोजराज द्विवेदी, डाइमंड वूक्स, न्यू दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  5. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र : विश्वकर्मा, सम्पादक एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१० ई।
  6. कौटल्य अर्थशास्त्र : कौटल्य, सम्पादक एबं अनुवादक उदयवीर शास्त्री, मिहिरचन्द्र लक्षमण दास, दिल्ली। 
  7. उणादि कोष: पाणिनि , सम्पादक एबं अनुवादक दयानंद सरस्वती, रामलाल कपूर ट्रस्ट, सोनीपत, हरियाणा, संस्करण २०१० ई।

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