जब पाकशाला में अन्न सिद्ध हो जाने पर उसमे से खट्टा, लवणान्न, क्षार अन्न, दालें को छोडकर शेष अन्न को हाथ की ब्रह्मतीर्थ से चूल्हे की अग्नि में निम्न मन्त्र से आहतियां दैं-
ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ धन्वन्तरये स्वाहा। इदं धन्वन्तरये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ विश्वेभ्योदेवेभ्यो स्वाहा। इदं विश्वेभ्योदेवेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये ( न मम) (इदं न मम) ॥ (मौनाहुति)
ॐ अग्नये स्वष्टकृते स्वाहा। इदमग्नये स्वष्टकृते ( न मम) (इदं न मम) ॥
अव बलि देने के पूर्व जहाँ जहाँ बलि देना होगा उस स्थान को झाडू से साफ कर देना चाहिए।
फिर से उस धृत मिश्रित अन्न को जहाँ जहाँ कहा गया है वहां वहां बलि दैं। बलि देने के पूर्व ओर पश्चात एक एक बार जल छिडके। पहले घर के बाहर चारो दिशाऔं मे बलि देना चाहिए
ॐ इन्द्राय नमः। इदमिन्द्राय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पूर्व में
ॐ यमाय नमः। इदं यमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ दक्षिण में
ॐ वरुणाय नमः। इदं वरुणाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पश्चिम में
ॐ सोमाय नमः। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ उत्तर में
ॐ महद्भ्यो नमः। इदं महद्भ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ मूख्य द्वार पर
ॐ गृहदेवताभ्यो नमः ॥ इदं गृहदेवताभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह में प्रवेश कर के गृह के भीतर
ॐ ब्रह्मणे नमः ॥ इदं ब्रह्मणे ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह के मध्य में
ॐ आकाशाय नमः ॥ इदं आकाशाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह से बाहर निकल कर आकाश की ओर
ॐ दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ यह घर के बाहर (दिन मे)
ॐ नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ बाहर (रात्रि मे)
फिर अपने आश्रित पशु ओर भिक्षु आदि को भोजन दे। गृह में स्थित अन्य लोगों को भोजन के बाद स्वयं भोजन करें।
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Monday, 4 February 2019
बलि वैश्वदेव विधि
Sunday, 3 February 2019
ब्रह्म यज्ञ
ब्रह्म यज्ञ पञ्च महायज्ञ में प्रथम हैं। यह दो भागों में विभाजित है - १. सन्ध्योपासना २. स्वाध्याय (वेद आदि सत् शास्त्र का अध्ययन करना।
इनमें सन्ध्योपासना को प्रथम करना चाहिए। ओर स्वाध्याय को अग्निहोत्र के पश्चात करना चाहिए।
इनमें सन्ध्योपासना को प्रथम करना चाहिए। ओर स्वाध्याय को अग्निहोत्र के पश्चात करना चाहिए।
स्वाध्याय शब्द का अर्थ :- इस का दो प्रकार के अर्थ हैं।
१. स्व + अध्याय (स्वस्य अध्ययनम्) अर्थात अपने आप का अध्ययन करना।
२. सु +आ+अध्याय अर्थात सब उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन करना।
प्रथम प्रकार का स्वाध्याय सन्ध्योपासना के अन्तर्गत आ जाता है। दूसरी प्रकार का स्वाध्याय वेद आदि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन हो जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की प्राप्ति और वृद्धि होता है।
१. स्व + अध्याय (स्वस्य अध्ययनम्) अर्थात अपने आप का अध्ययन करना।
२. सु +आ+अध्याय अर्थात सब उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन करना।
प्रथम प्रकार का स्वाध्याय सन्ध्योपासना के अन्तर्गत आ जाता है। दूसरी प्रकार का स्वाध्याय वेद आदि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन हो जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की प्राप्ति और वृद्धि होता है।
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