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Saturday, 1 July 2017

गृह वास्तु का ९ सूत्र

हम सभी जानते है की वास्तु विद्या भारतीय शिल्प शास्त्र का एक अङ्ग है । वास्तु विद्या भी अनेक प्रकार के है यथा गृह वास्तु, प्रसाद वास्तु, मन्दिर वास्तु, दूर्ग वास्तु, नाट्य शाला वास्तु, यान वास्तु इत्यादि । उसमे गृह वास्तु वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । जव हम गृह वास्तु का अध्ययन करते है तो हमे इससे आठ मुख्य सूत्र ओर एक गौण सूत्र प्राप्त होते है । यथा

  १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव । 
 २.  निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति ।
  ३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव ।
  ४.   गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण ।
 ५.  जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना ।
 ६.    भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव ।
  ७.   देश-काल-पात्र का परिगणन ।
  ८.    भूगोल के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

यह आठ मुख्य सूत्र है । और एक गौण सूत्र भी है ।

9.       ९. गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

प्रश्न उठता है कि जो गौण सूत्र है वह मुख्य सूत्र संख्या 8 का ही एक भाग है ! क्योकि खौगलिय ग्रहौं जो भूगल के उपर जव प्रभाव डालता है तो क्या वह गृह मे निवास करने वाले प्रतेक परिवार के सदर्स्य के उपर प्रभाव नहि डालते होगे ? अगर कहे कि प्रभाव डालता है तो अलग से सूत्र लिखने कि क्या जरुरत ? अगर यह कहे कि प्रभाव नहि डालता है तो गौण सूत्र लिखने कि क्या आवश्यकता ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है । भाव को स्पष्ट करने के लिये कभि कभि एक सूत्र को दो भाग मे वाटा जाता है । उसमे जो मुख्य प्रसङ्ग के साथ हो तो वह मुख्य सूत्र कहलाता है । ओर जो मुख्य प्रसङ्ग से अलग है वह गौण सूत्र कहलाता है । इसलिये अर्थ को स्पष्ट करने के लिये सूत्र संख्या 8 को दो भाग मे वाट कर दिया गेया है।

1) भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव अर्थात गृह और उसके भूगलिक स्थिति के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।
2) गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

किन्तु पहला भाग मुख्य विषय के साथ सम्पक है इसलिये वह मुख्य सूत्र हूआ । और दूसरा भाग इस विषय से अलग है इसलिये वह गौण सूत्र हूआ ।

एक दूसरा प्रश्न उठता है कि सभी वास्तु मे उपयोग होता है ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि सभी वास्तु मे उपयोग नहिं होता है । प्रसङ्ग के अनुसार कुच्छ सूत्र कम या अधिक होता हैं । यह विषय प्रसङ्ग से अलग है इसलिये यहाँ हम उसको यहाँ विचार नहि करंगे । लेकिन फिर कभि हम इसका विचार करेङ्गे ।
अव चलते है का संक्षेप मे विचार करते है ।

 १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव :- आज हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है हमे थोडा वहुत परिवेश का मन्युष्य के उपर क्या प्रभाव होता है यह हम सव जानते हैं । किन्तु परिवेश का गृह पर भी प्रभाव पडता है यह वहुत कम लोक ही जानते है । जैसे आच्छा परिवेश मे एक बालक का आच्छा स्वभाव और चरित्र बनता है । और खराव परिवेश मे एक बालक का स्वभाव और चरित्र खराव बनता है । उसि तरहा शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है । और कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । इसलिये हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है ।

पश्न उठता है कि जव हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है, तो क्या प्राचिन वास्तुकार के मतों को मानना जरूरी है ? अगर मानना जरूरी है तो आज के युग के अनुसार इस का वैज्ञानिक व्याख्या होना चाहिए ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि पहले जो वास्तुकार होते थे वह उस समय का देश-काल-पात्र को लेकर पुस्तक लिखा करते थे । लेकिन आज के युग मे उस का १00% लागु करना कष्ट है । क्यूकि उस समय का देश-काल-पात्र अलग था और आज का देश-काल-पात्र अलग है । लेकिन जो नियम है वह स्वास्वत है । वह कभि देश-काल-पात्र के साथ परिवर्तन नहि होता । हमारा काम है की उस नियम को देश-काल-पात्र के अनुसार व्यवहार मे लाना ।

तो हम हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है उस का वैज्ञानिक कारण है कि कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । और शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है ।

इस नियम को अगर आज के युग मे प्रयोग करेंग तो उस का व्याख्या इस प्रकार होगा किसि भि कोलाहल और अशान्त परिवेश जेसे मन्दिर के पाश, वस स्टाण्ड, रेल्व स्टेसन, विमान वन्दर, सिनिमा हल, कारखाना, आदि, राज रास्ता से अर्थात राष्ट का मुख्य रास्ता, राज्य का मुख्य रास्ता, रेल रास्ता आदि, कोलाहल परिवेश अर्थात वाजर, पाठशाल आदि, अशान्त परिवेश अर्थात शम्शान, चिकिच्छालय, आदि के पाश गृह वनाना मना है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

 निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति :- निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति का अर्थ है जहाँ हम गृह का निर्माण करते है उस निवास स्थान पर हम ज्यादा समय तक सुख सुविधा मै रहे पाएंगे । जैसे केसा है भूमि उर्वरता, रंग, गन्धादि का परिक्षण, भूमि ठोस हे कि नहि उस का परिक्षण, उस स्थान मे जल कि मात्र केसा है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्ष भर तापमान केसा रहता है उस का परिक्षण अर्थात थण्डा है या गरम, वहाँ किस प्रकार के जीव, वृक्ष और द्रव्य मिलता है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्षभर वायु का गति का परिक्षण इत्यादि ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे। 

३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव :- पृथिवि, जल, वायु, अग्नि और आकाश इसको पञ्च महाभूत कहते है । इन पञ्च महाभूतों का गृह मे क्या प्रभाव होता है उस का परिक्षण । क्योकि इस का परिवार के आरोग्य के साथ सिधा सम्पर्क है । गृह मे यदि पञ्च महाभूतों का उच्चित सम्नवय रहेगा तो गृह मे निवास करने वालो का स्वस्थ ठिक रहेगा । इसलिए गृह मे उचित मात्रा मे वायु और सूर्य किरण आना चाहिए । 

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

४.  गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण :- मानव हमेशा सुन्दरता का पूजा करते आया है और हमेशा करता रहेगा । मानव क्य़ा पशु-पक्षि-कीट-पतंग सभि सुन्दरता का पूजा करते है । तो मानव क्य़ो नहिं करेगा । क्यो कि हर सुन्दर वस्तु सभि को आनन्द देता है । और सभि चाहते है सुन्दर दिखन के लिए, सुन्दर द्रव्य पाने के लिए, सुन्दर गृह मे रहने के लेए । गृहादि को केसे सुन्दर वनाया जाये यह भि वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । इसलिए गृह का आभन्तर और वाह्य दोनो सुन्दर होना चाहिए । जिसको देखकर मन प्रफल्ल हो जाए ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।  

 ५. जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना :- क्या आपने कभि मधुमक्षि के छाता को देखा है । मधुमक्षि जव अपनि छाता तयार करता है तव अपनि रहने के लिए, अपनि अण्डे के लिए, अपनि खाद्य के लिए, रानि मधुमक्षि के लिए इत्यादि अलग अलग शाला वनते है । तो मानव अपने आवश्यकता के अनुसार गृह मे शाला का परिकल्पना यथा स्नानागार, पाकशाला, शयनशाला, भजनशाला इत्यादि अलग अलग शालाएँ नहीं कर सकता। य़ह प्रत्यक परिवार के लिए और परिवार के सद्रस्य के रुचि के अनुसार अलग अलग शाला वनाया जाता है और कुच्छ कुच्छ शालाएँ सभि के लिए एक जेसा होता है।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

६.   भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव :- हम सभि जानते है प्रत्यक पदार्थ मे कुच्छ शक्ति रहता है । उस तरहा हमारे पृथिवि और आकाशादि मे कुच्छ शक्तियां है । उस मे पृथिवि के शक्ति का परक्षण हम भूमि के उवरता के द्वारा जान सकते है । ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं को हम आयादि साधन ओर सही दिशा के द्वारा गृह को ऊजावान कर सकते है । उससे हम गृह मे पृथिवि के शक्ति ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं एकत्रित करके अपने जीवन को सफल कर सकते है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे । 

७.   देश-काल-पात्र का परिगणन :- जैसे सभि रोग के लिए एक औषधि नहि होता है । अलग अलग रोग के लिए अलग अलग औषधि होता है । उस तरहा वास्तु के नियम देश-काल-पात्र के अनुसार कुच्छ वदल जाता है । जैसे गृह शीतप्रधान देश मे अलग होता है और ग्रीष्मप्रधान देश मे अलग होता है यह देश के अनुसार उदाहरण हुआ। 200 साल पहले गृह निर्माण द्रव्य अलग होता था । और आज गृह निर्माण द्रव्य अलग है, यह काल के अनुसार उदाहरण हुआ । एक समान्य व्यक्ति के लिए गृह जैसे वनाया जाता है, एक धनि व्यक्ति के लिए उससे कहि सुन्दर वनाया जाता है यह पात्र के अनुसार उदाहरण हुआ ।

यह देश-काल-पात्र का संक्षेप परिगणन हुआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे ।

८.   भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- भूमि पर जो कुच्छ शक्ति ऊत्पन होता है उसका प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क आकशिय ग्रहौं, नक्षत्रों आदि से है । इसको आधुनिक विज्ञान भी मानता है । समुन्द्र के लहरे पर्णिमा के दिन वडा होता है और अमावास्या के दिन छोटा होता है यह एक छोटा उदाहरण है भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं के प्रभाव का। पृथिवि के कहाँ कहाँ पर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है । सूर्य और अन्य ग्रहका विभिन्न राशिपर क्या प्रभाव पडता है ? सूर्य के गतिका वास्तु परुष के गति साथ क्या सम्पर्क है ? वास्तुपुरुष के सिर ऐशन्य कौण मे क्यों है ? ईत्यादि सव भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव के भितर आता है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे । मनुष्यादि 

९.  गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- जव भूमि पर ग्रहौं, नक्षत्रों आदि के प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है, तो भूमि पर निवास करने वाले जीव, मनुष्यादि पर भि प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है । एक छोटा उदाहरण कहता हूँ पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगियों का पागलपन वढ जाता है । इस से पता चलता है कि ग्रहौं, नक्षत्रों का मनुष्य के उपर सम्पर्क होता है । मनुष्य के उपर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे ।

प्रश्न उठता है कि एक हि गृह का वास्तु एक होते हुए गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य अलग अलग क्यो है ?

इस का उत्तर यह है कि मनुष्य का जीवन को अगर वैल गाडि मान लिया जाए । तो इस वैल गाडि का दो पहया है भाग्य और वास्तु । कर्म इस वैल गाडि का वाकि अन्श है । मन और बुद्धि इस गाडि का खिचने के लिए दो वैल है । और मनुष्य का आत्मा इस वैल गाडि का चालक । अगर सव कच्छु ठिक है तो गाडि आरम से चलता है । किन्तु दो पहयामें से एक पहया खराप हो जाए । या दो वैलमें से एक ठिक से काम ना करे । या गाडि का वाकि अंश खराप हो जाए तो चालक गाडि को ठिक से चला नहि पाता । इस प्रकार भाग्य, वास्तु, कर्म, मन और बुद्धि सव कुच्छ ठिक हे तो मनुष्य का जीवन आरम से कटता है । अगर इसमे से एक ठिक नहि है तौ मनुष्य जीवन का ईह लोक और पर लोक दोनो खराब हो जाता है । 

मेरा अगला ब्लॉग होगा वास्तु से ब्रह्म ज्ञान


Thursday, 15 June 2017

वास्तु और पुरुषार्थ चतुष्ठय

आजकाल वास्तु की चर्चा काफी ज्यादा हो रहा है। लोगो वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करना पसंद करते है। वास्तु की पुस्तक की पुस्तक दुकानो पर काफी ज्यादा उपलब्ध हो रहा है। गणमाध्यम चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक हो या समाचार पत्र वास्तु के ऊपर चर्चा हो रहा है। ऐसा लग रहा है हम वास्तु युग मे आ चुके है। 

प्रश्न उठता है वास्तु का अर्थ क्या है ? और उसका मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है ? मैने कुछ लोगों को पूछा वास्तु कहने से आप क्या समझ ते है ? उनका जो उत्तर था वो इस तरहा से था गृह के वस्तुओं को दिशा के अनुसार रखना या कोई दीवार को तोड़फोड़ करना या कोई यन्त्र दीवारों पर लगाना आदि को वास्तु कहते है। क्या सच्च मे इसको वास्तु कहते है ! इसको वास्तु नहीं कहते। हाँ इतना जरूर कहूँगा वास्तु के नाम ज्योतिषियों ने लोगो की मन मे भय की सृस्टि करके रुपया कमाने का अच्छा उपाय कर रखे है। जवतक हम वास्तु क्या है इसका सही जानकारी ना हो जाए और वास्तु का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, इसकी सही जानकारी ना हो जाए, तवतक हम इस वास्तु रूपी अन्धकूप मे पड़े रहेंगे।

वास्तु शब्द संस्कृत भाषा से आया है। संस्कृत भाषा मे वास्तु शब्द का अर्थ है वसन्ती प्राणीनो यत्र  अर्थात जहाँ प्राणि निवास करते है उसको वास्तु कहते है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार वास्तु शब्द इस तरह तैयार हुआ है, वस निवासे + वसेरगारे णिच्च (उणादि कोष १, ७० )। अर्थात वस धातु के सा णिच्च प्रत्यय से वास्तु शव्द का उत्त्पन होता है।

वास्तु शव्द का अर्थ अन्य पुस्तको मे किया लिखा है विचार करते है। हलायुध कोष के अनुसार वास्तु कहने से इस प्रकार लिखा है "वास्तु संक्षेपतो वक्ष्य गृहबे विघ्ननाशानं। ईशानकोणादरभ्य हयोका शीतिपदे त्यजेत्  " अर्थात वास्तु संक्षेप मे ईशान्यादि कोण से प्रारंभ होकर गृह निर्माण का वो कला है जो गृह का विघ्न - प्राकृतिक उत्पातो -उपद्रवो से वचता है। वास्तुविश्वकोष मे वास्तु का अर्थ है "यह ग्राम, पुर, द्रुग, पत्तन, पुरभेद, आवास भवन और निवास भूमि का वाचक है। " इसप्रकार अमरकोष वास्तु शब्द का अर्थ है " गृहरचना विच्छिन्न भूमे " अर्थात गृह रचना के लिये अविच्छन्न भूमि को वास्तु कहते है।

किन्तु मेरा मत है वास्तु एक ऐसा गाणितिक विज्ञान का प्रयोगात्मक रूप है, जो मन्युष्य को निवास स्थल मे त्रिविध दुःख अर्थात आध्यात्मिक दुःख, आधिभौतिक दुःख और आधिदैविक दुःख को निवारण के लिये और पुरुषार्थ चतुर्वर्ग अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त के लिये एक माध्यम है।

वास्तुशास्त्र को कुछ लोक स्थापत्य शास्त्र कहते है तो कुछ लोक शिल्प शास्त्र कहते है। मेरा मत है वास्तुशास्त्र को स्थापत्य शास्त्र तो कह सकते है किन्तु शिल्प शास्त्र नहीं कह सकते। क्युकि वास्तुशास्त्र शिल्प शास्त्र का एक अंग है। फिर कभी शिल्प शास्त्र क्या है इस का वर्णन करेंगे।

आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति जिसे इंग्लिश मे आर्किटेक्चर और प्राचीन भवन निर्माण पद्धति को वास्तुशास्त्र कहते है। यह दोनों एक जैसा होकर भी दो अलग अलग विषय है। आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति के अनुसार कैसे उत्तम गृह का निर्माण किया जा सकता है वो किसि भी भवन निर्माणकरि (आर्किटेक्ट) कह सकता है, किन्तु वहा जो निवास करेगा वो आनंद मे रहेगा उसका प्रमाण दे नही सकता। किन्तु एक प्राचीन भवन निर्माणकरि (वास्तुशास्त्री ) कह सकता है की यहाँ जो निवास करेगा वो सुख मे रहे पायेगा या नहीं। यदि हम वास्तु शास्त्र का मूल सिद्धान्त को लेकर आधुनिक भवन निर्माण कला के मिलाकर भवन निर्माण करते है तो हम एक सुखी जीवन पा सकते है। और यदि हम भवन निर्माणकला से वास्तु विज्ञान को निकाल दिया जाये तो हम ईट, पथर, लोहा, सीमेन्ट आदि का एक सुव्यवस्थित सुंदर आकर वस्तु ही निर्माण होगा किन्तु उसे एक गृह के रूप मे विवेचिन नहीं हो पाएगा। कारण गृह किसीको कहते है उसका सुन्दर वर्णन
वृहदवास्तुमाला मे लिखा है।

स्त्रीपुत्रादिकभोगसौख्यजननं धर्मार्थाकामप्रदम्।
जन्तुनामयनं सुखास्पादमिदं शीतामवुघर्मापहम। (४ )

स्त्रीपुत्र आदि का भोग, सुख, धर्म, अर्थ, काम को प्रदान करनेवाला , प्राणियों को सुख का स्थान और शीत, वायु, गरम अदि कष्ट से रक्षा करने वाला गृह है।

संसारमे जितने भी प्राचीन मानव सभ्यताए है प्राय सभी गृह निर्माणको एक सांसारिक कृत्य के रूप मे मानते है किन्तु भारत मे गृह निर्माणको एक धार्मिक कृत्य के रूप मे मानते है। उस का क्या कारण है ? क्यूँ के हमारे ऋषियों का यह मानना है, जहा मनुष्य रहेगा वहा अपनी निवास स्थान पर पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करेगा। जब तक हम इस धार्मिक तत्त्वका मूल रहस्य विन्दु तत्त्वको नहीं समझ पायेंगे, तबतक हम वास्तुशास्त्र का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, हम ठीक से समझ नहीं पाएंगे।

अव प्रश्न उठता है पुरुषार्थ चतुष्ठयका वास्तु के साथ क्या सम्पर्क है ? उसका वर्णन हम यहाँ करेंगे।

१. धर्म :- धर्म क्या है ?
आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का प्रथम सूत्र मे लिखा है

सुखस्य मूलं धर्म : ।(चाणक्यसूत्र १। १ )

अर्थात किसी भी व्यक्ति या समाज का सुख का मूल धर्म है। तो धर्म क्या है ? संस्कृत मे धर्म की व्याख्या इस तरहा किया जाता है धरणात् धर्म इत्याहु : या ध्रीयते अनेने लोक : इत्यादि के अनुसार जिसे आत्मोन्नति और उत्तम सुख को धारण किया जाता है वह धर्म है अथवा जिसके द्वारा समस्त लोक को धारण किया जाता है अर्थात व्यवस्था या मर्यादा मे रखा जाता है वह धर्म है। हम इसको इस तरहा कह सकते है आत्माका उन्नति करने वाला, मोक्ष और उत्तम व्यावहारिक सुखों को देनेवाला आचरण, कर्त्तव्य, अथवा श्रेष्ठ विधान या नियम को धर्म कहते है। स्थूल रूप मे हम धर्म को दो भागो मे भाग किया जा सकता है।
i . मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थमे )
ii . गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे )

i. मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थ मे) : आध्यात्मिक अर्थ मे आत्मा का उपकारक, मोक्षको प्राप्त करनेवाला आचरण को धर्म कहा जाता है।  यह धर्म का मुख्य अर्थ है।

ii. गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे) : लौकिक अर्थमे या व्यावहारिक क्षेत्रमे मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति करने वाला, मानवत्व और देवत्व का विकास करने वाला, उत्तम सुख को प्रदान करने वाला और श्रेष्ठ व्यावहारिक कर्त्तव्य, मर्यादा और विधान को धर्म कहा जाता है। यह लौकिक अर्थ मे होने के कारण देश काल और परिस्थिति के अनुसार इस का अर्थ वदल जाता है।

तो धर्म के साथ वास्तु का संपर्क है ?

धर्म जिसका वर्णन हम उप्पर कर चुके है चाहे मुख्य रूप मे हो या गौण रूप मे प्रत्यक्ष्य या परोक्ष्य रूप मे गृह और समाज के ऊपर निर्भर करता है। इसको हम ऐसे कह सकते है वास्तु के ऊपर निर्भर करता है। जहाँ मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति होने मे काफी सहायता मिलता है। इसलिए यदि गृह निर्माण के वाद कर्त्ता और उसके परिवार का उन्नति नहीं हुआ तो गृह निर्माण करने का क्या प्रयोजन ?

२. अर्थ :- प्रथम हम अर्थ क्या है यह समझते है।

आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र मे लिखा है

धर्मस्य  मूलं  अर्थ :   (चाणक्यसूत्र १।२ )

अर्थात धर्म का मूल अर्थ है। यदि किसी व्यक्ति या समाज के पास अर्थ अर्थात धन नहीं है तो वो व्यक्ति या समाज धर्म का उपार्जन नहीं कर सकता। अर्थ का एक ही प्रमाण यहाँ लिख रहा हूँ, इसका कारण है की प्राय सभी धन के विषय मे परिचित है। पंचतन्त्र मे लिखा है

यस्यार्थास्तुस्य मित्राणि, यस्यार्थास्तुस्य बान्धवा : ।
यस्यार्था: स पुमाल्लोके, यस्यार्था: स च पण्डित : । (१ / ३ )

अर्थात धनवान पुरुषको सभी मित्रता करना चाहता है। धन अगर पास है तो परिवार और स्वजन लोगो आत्मीयता प्रदर्शन करते है। धनवान पुरुष समाज मे उत्तम पुरुष के रूप मे गणना होता है। और धन के द्वारा वो समाज मे विद्वान के रूप मे जाना जाता है।

इसतरहा बहुत सारे उदाहरण है किन्तु लिखना सिर्फ कागज भरनी की सामान है। इसलिए मे ज्यादा नहीं लिख रहा हू।

अगर किसी भी गृहस्थ उसका गृह निर्माण करने के वाद उसका परिवार का प्रत्येक व्यक्ति का अर्थ मे वृद्धि नहीं हुआ तो गृह निर्माण का क्या लाभ ? इसलिए गृह निर्माण करने के वाद गृहकर्त्ता का अर्थ मे वृद्धि होना अत्यंत आवश्यक है। यही वास्तु का अर्थ का साथ सम्पर्क है।

३. काम:- मे काम के वारे मे ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा। किन्तु इतना लिखूंगा यहाँ काम का मतलव यौन सुख से है।

गृह निर्माण के वाद गृहपति या गृहपत्नी को पूर्ण दाम्पत्य सुखका प्राप्त होना चाहिए। पुत्र -पौत्र आदि से गृह बृद्धि होना चाहिए। अगर गृह निर्माण के वाद परिवार मे कलह, मानसिक चिन्ता या परिवार मे सुख का अभाव होता है तो गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ काम का सम्पर्क है।

४. मोक्ष :-  महाराज मनु ने अपनी मनुस्मृति मे लिखा है

वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियणां च संयम : ।
धर्मक्रियात्मा चिन्ता च नि:श्रेयसकर परम ।

अर्थात वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इद्रिया संयम, धर्म का पालन, और परमात्मा का ज्ञान और ध्यान यह मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वोत्तम कर्म है।

इसलिए गृह निर्माण करने पर गृहपति और इसके परिवार को मृत्यु के वाद मोक्ष को और थोड़ा अग्रसर नहीं हुआ और परजन्म मे इस जन्म से अच्छा नहीं हुआ तो भी गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ मोक्ष का सम्पर्क है।

इसतरहा मैने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संक्षप परिचय किया है फिर कभी में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तृत वर्णन करूँगा।

इसलिए एक समाज या व्यक्ति के लिए वास्तुशास्त्र का क्या लाभ उसका उत्तर विश्वकर्मावास्तुशास्त्र मे लिखा है।

शास्तेणानेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम् ।
चतुर्वर्गफल प्राप्तिस्सल्लोकश्च भवेद् ध्रुवम् ।। ( १ /३० )
शिल्पशास्त्र परिज्ञाना  न्यर्त्ये पी  सुरमं भवेत् । (१ / ३१ )

अर्थात समस्त लोकोमे विभिन्न शास्त्र का लख्य है, परम सुख को प्राप्त करना। इहलोकमे पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करना। और सत्यलोक मे अनंत काल तक आनंद मे रहना। इस शिल्पशास्त्र को जानने वाला इहकाल मे पृथिवी मे देवत्व को प्राप्त करने के कारण वो सम्पूर्ण समाज का कल्याण करने के लिए हमेशा उद्यम करता रहता है,  इसलिए वो भूलोक में  देवता तुल्य हो जाता है। मृत्यु के वाद उस शिल्पी का शिल्प उसको अमरत्व ले आता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. मनुस्मृति : मनु, भाष्यकार डॉ. सुरेन्द्रकुमार, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  2. पञ्चतन्त्र: श्रीविष्णुशर्मा प्रणीत, व्याख्याकार श्री श्यामचरण पाण्डेय, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, संस्करण २००६ ई।
  3. बृहद वास्तुमाला: श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी संस्करण २०१४ ई।
  4. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ भोजराज द्विवेदी, डाइमंड वूक्स, न्यू दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  5. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र : विश्वकर्मा, सम्पादक एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१० ई।
  6. कौटल्य अर्थशास्त्र : कौटल्य, सम्पादक एबं अनुवादक उदयवीर शास्त्री, मिहिरचन्द्र लक्षमण दास, दिल्ली। 
  7. उणादि कोष: पाणिनि , सम्पादक एबं अनुवादक दयानंद सरस्वती, रामलाल कपूर ट्रस्ट, सोनीपत, हरियाणा, संस्करण २०१० ई।

Monday, 8 May 2017

गृहारम्भ तिथि,पक्ष और वार विचार

पक्ष के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

अब हम पक्ष के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।  

हम सभी जानते है चंद्र मास मे दो पक्ष होता है।
प्रथम शुक्ल पक्ष
और दूसरा कृष्ण पक्ष।

वास्तुगोपाल का लेखक के अनुसार और देवीपुराण का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष मे गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु कृष्ण पक्ष मे गृहरम्भ का फल चौरभय होता है। परन्तु राजमार्ताण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण इस प्रकार है शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा निर्वल होता है। इस कारण गृहरम्भ का फल अशुभ होता है। उसी प्रकार शुक्ल पक्ष पञ्चमी से सप्तमी पर्यन्त चन्द्रमा हीनवली होता है। और शुक्ल पक्ष अष्टमी से दशमी पर्यन्त चन्द्रमा मध्यवली होता है। और शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु नारद संहिता का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष  के एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त और कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण यह है की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ हो सकता है।

तिथि के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

हम सभी जानते है चंद्र मास मे ३० दिन होता है। उसमे कृष्ण पक्ष का १५ दिन और शुक्ल पक्ष का १५ दिन।

कृष्ण पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी १५. अमावस्या। 

शुक्ल पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी, १५. पूर्णिमा।

अब हम तिथि के अनुसार गृहारम्भ का फल विचार करेंगे।

१. प्रतिपदा : शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण करने से दुःख को प्राप्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से दरिद्रता को प्राप्त होता हैं। किन्तु वस्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

२. द्वितीया: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार द्वितीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। किन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वितीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

३. तृतीया : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न अनुसार तृतीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष तृतीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल तृतीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

४. चतुर्थी : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्थी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। परन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। 

५. पञ्चमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पञ्चमी तिथि में गृह निर्माण करने से चित्तचांचल्य होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष पञ्चमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल पञ्चमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

६. षष्ठीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार षष्ठी तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

७. सप्तमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार सप्तमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष सप्तमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल सप्तमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

८. अष्ठमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अष्ठमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से उद्वास होता है।  

९. नवमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार नवमी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धान्य का नाश होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं।

१०. दशमीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार दशमी तिथि में गृह निर्माण करने से चौरभय रहता हैं। किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष दशमी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल दशमी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

११. एकादशीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार एकादशी तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल एकादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं 

१२. द्वादशीवास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार द्वादशी तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१३. त्रयोदशी :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार त्रयोदशी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल त्रयोदशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१४. चतुर्दशी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्दशी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से स्त्रीविनाश होता है।  

१५. अमावस्या :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अमावस्या तिथि में गृह निर्माण करने से गृहस्वामी का नाश होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से स्थाननाश  होता हैं।वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब, से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।   

१६. पूर्णिमाशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पूर्णिमा तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।  परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है किन्तु पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं।

वार के अनुसार गृहारम्भ फल विचार
अब हम वार के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।

हम सभी जानते है ज्योतिष शास्त्र मे वार सात है।
१. रविवार
२. सोमवार
३. मंगलवार
४. बुधवार
५. गुरुवार
६. शुक्रवार
और ७. शनिवार  

१. रविवार: शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार रविवार के दिन गृह निर्माण करने से अग्नि का भय रहता है। इस मत का समर्थन राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक करता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है।

२. सोमवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार सोमवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक करता है। किन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से अर्थलाभ होता है। परन्तु बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ किन्तु  गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है।

३. मंगलवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मंगलवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे वज्रपात होता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। परन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से क्षति होता है। और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना मृत्यु का भय लगा रहता है।

४. बुधवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार बुधवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

५. गुरुवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार गुरुवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

६. शुक्रवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शुक्रवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

७. शनिवार:  शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शनिवार के दिन गृह निर्माण करने से धन का क्षय और शोक होता है। किन्तु दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार को गृह निर्माण करने से अशुभ होता है। परन्तु मुहूर्तदीपक का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है। बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करनें से गृह स्वामी शोकातुर रहता है। और राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से भय रहता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. दीपिका वा शुद्ध दीपिका : महामहोपाध्याय श्रीनिवास प्रणीत कन्हेयालाल मिश्र टिका, खेमराज  श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००८ ई।
  2. मुहूर्त दीपक : श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  3. वास्तुरत्नावली : श्रीजीवनाथ झा, टीकाकार श्रीमदच्युतानन्द झा , चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण  १९८१ ई। 
  4. बृहत शिल्पशास्त्र : दयानिधि खड़ीरत्न, धर्मग्रन्थ स्टोर, कटक, संस्करण २००२ ई।
  5. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ. निमाई बेनर्जी और रमेशचंद्र दाश, ज्ञानयुग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर, संस्करण २०१४ ई।
  6. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  7. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी संस्करण २००६ ई।
  8. वस्तुराजबल्लभ : श्रीमंडन सूत्रधार,  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई। 
  9. वास्तुरत्नाकर : श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २०१२ ई।
  10. वास्तु सौख्य : श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला, संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी, संस्करण २०१० ई। 
  11. वास्तुकल्पलता : डॉ. हरिहर त्रिवेदी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७  ई।

Tuesday, 18 April 2017

गृहारम्भ नक्षत्र विचार

भारतीय ज्योतिष मे नक्षत्र २७ प्रकार के होते है 

१. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी,५. मृगशिरा, ६. आद्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्या, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वा फाल्गुनीम, १२. उत्तरा फाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढा, २१. उत्तराषाढ़ा, २२. श्रवणा, २३. धनिष्ठा, २४. शतभिषा, २५. पूर्वा भाद्रपद, २६. उत्तरा भाद्रपद, २७. रेवती।

अब हम प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार गृहारम्भ का फल विचार करेंगे।

१. अश्विनी: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र और वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार अश्विनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रवास होता हैं।

२. भरणी: वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार भरणी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रवास होता हैं। 

३. कृत्तिका : वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार कृत्तिका नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं। 

४. रोहिणी: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार रोहिणी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं।  ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

५. मृगशिरा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं।

६. आद्रा: ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार आद्रा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

७. पुनर्वसु :  ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

८. पुष्या: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार पुष्या नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

९. आश्लेषा: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार आश्लेषा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

१०. मघा: शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार और ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार मघा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं।  किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

११. पूर्वा फाल्गुनी: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

१२. उत्तरा फाल्गुनी:  वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं।

१३. हस्त: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार हस्त नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं। 

१४. चित्रा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार चित्रा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं।

१५. स्वाती: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार स्वाती नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।

१६. विशाखा: वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार विशाखा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।

१७. अनुराधा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार अनुराधा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं।  

१८. ज्येष्ठा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार और शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं।

१९. मूल: वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार मूल नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं। 

२०. पूर्वाषाढा: वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार पूर्वाषाढा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं। 

२१. उत्तराषाढ़ावास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तराषाढ़ा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२२. श्रवणा: शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार और राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार श्रवणा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल एबं पराशर मतो मे शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। 

२३. धनिष्ठाराजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार धनिष्ठा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२४. शतभिषा: राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार शतभिषा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२५. पूर्वा भाद्रपद: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं।

२६. उत्तरा भाद्रपदवास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं।

२७. रेवतीराजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार रेवती नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार और ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

उपस्कारक ग्रंथ वास्तु
  • बृहद वास्तुमाला : श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
  • वास्तुरत्नाकर :श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २०१२  ई।
  • शिल्पशास्त्र :बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २००६  ई।
  • मुहूर्त दीपक :श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २००६  ई। 
  • मुहूर्त चिंतामणि :श्रीरामाचार्य, व्याख्याकार महीधर शर्मा,खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई , २००८  ई।
  • ज्योतिष रत्नमाला:श्रीपति भट्टाचार्य,  डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली २००४  ई।
  • वास्तु सारणी :श्री श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, मास्टर खेलाडी लाल संकटा प्रसाद, वारणशी, २०१३  ई। 
  • वस्तुराजबल्लभ :श्रीमंडन सूत्रधार  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई।
  • वास्तुकल्पलता :डॉ. हरिहर त्रिवेदी ,चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७ ई।
  • वास्तु सौख्य :श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला , संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी,  संस्करण २०१० ई। 
  • सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र :डॉ  निमाई वानारजी , रामचंद्र दास, ज्ञानजूग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर।

Wednesday, 29 March 2017

मास के अनुसार गृहारंभ फल

मास ४ प्रकारके होते  हैं

१. चंद्र मास
२. सौर  मास
३. सावन मास
४. नक्षत्र मास

आज हम पंचांग के ऊपर चर्चा न करके चंद्र मास, सौरमास और चंद्रसौर मास  के अनुसार के अनुसार गृहारंभ का फल चर्चा  करेंगे।

चंद्रमास के अनुसार गृहारंभ फल :-

१. चैत्र : विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक के अनुसार चैत्र मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को व्याधि होता है । इस मत का समर्थन वास्तु गोपाल का लेखक और वास्तु प्रदीपका लेखक करते हैं। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति जी ने इस मास मे गृह निर्माण करने का फल गृहपति को शोक होता हैं। इस मत का समर्थन शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, शिल्पदीपक के लेखक, और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र करते हैं।

२. वैशाखशिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार वैशाख मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन -रत्न की प्राप्ति होता है। इस मत का समर्थन ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपतिशिल्प दीपक के लेखक, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करते हैं। किंतु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत का संग्रह किया है उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य प्राप्ति होता है ।

३. ज्येष्ठ: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार ज्येष्ठ मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मृत्यु होता है। इस मत का समर्थन ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करते है। किंतु शिल्प दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृह मे रहने वालो को पीड़ा होता है।

४. आषाढ़: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार आषाढ मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन लाभ और पशुधन की वृद्धि होता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का पशुधन मे हानि होता है। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को भृत्य और रत्नो की प्राप्ति होता है, किन्तु गृहपति का पशुधन की हानि होता हैं।

५. श्रावण: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार श्रावण मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को भूमि  का लाभ होता है। शिल्प  दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन की वृद्धि होता है। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को द्रव्य की वृद्धि होता है। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक और वास्तु  प्रदीप के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को मित्र का लाभ होता है। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार श्रावण मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पशुधन की वृद्धि होता है। किन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य की प्राप्ति होता है। वास्तु गोपाल के लेखक ने इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मृत्यु  होता है।

६. भाद्रपद: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार भाद्रपद मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का हानि होता है। और इसका समर्थन  वास्तु गोपाल के लेखक करता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार गृह निर्माण फल शुन्य होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति के मत मे इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का विनाश होता हैं। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक और वास्तु  प्रदीप के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मित्र की हानि होता हैं।

७. आश्विन: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे आश्विन मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति पत्नीका  का नाश होता है। इस का समर्थन वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति के गृह मे कलह होता है। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र ओर विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति के गृह मे युद्ध होता है। परन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने वशिष्ठ मत का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का पुत्र -पौत्र -धन की वृद्धि होता हैं।

८. कार्त्तिक: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे कार्त्तिक मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को बहुपत्नी प्राप्ति होता हैं। किन्तु शिल्प  दीपक के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का नाश होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति की भृत्य का क्षय होता है। विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु गोपाल के लेखक  और वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन - धान्य की लाभ होता है। परन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य प्राप्ति होता हैं।

९. मार्गशीष: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे मार्गशीष मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन की प्राप्ति होता हैं। इसका समर्थन शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तु प्रदीप के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक और वास्तु गोपाल के लेखक करता है। किन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का धन की वृद्धि होता है। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास  गृह निर्माण करने से गृहपति को धान्य की लाभ होता है। किंतु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य होता हैं।

१०. पौष: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे पौष मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को चौर और तस्करों का भय होता है। इसका समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु प्रदीप के लेखक और  वास्तु गोपाल के लेखक करते है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को गृह मे धन - सम्पदा का आगमन होता हैं। परन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धान्य का लाभ होता हैं।

११. माघ: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे माघ मास मे गृह निर्माण करने से अशुभ, गृहपति को भय और अग्नि का भय होता हैं। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तुराजवल्लभ  के  लेखक मण्डन मिश्र और वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को अग्नि का भय होता है। परन्तु वास्तु प्रदीप के  लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को बहुत लाभ किन्तु अग्नि भय होता हैं। ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आराग्य प्राप्ति होता हैं।

१२. फाल्गुन:  शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे फाल्गुन मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को स्वर्ण की प्राप्ति होता है। शिल्प दीपक के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करना श्रेष्ठ होता हैं। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन प्राप्ति होता हैं। ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को श्री प्राप्ति होता हैं। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को लक्ष्मि और वंश मे वृद्धि होता हैं। वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को रत्न की प्राप्ति होता हैं। वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र का लाभ होता हैं। किन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य होता हैं।

सौरमास के अनुसार गृहारंभ फल:- 
अव हम सौर के अनुसार गृहारंभ का फल सौरमास २ प्रकार के होता है।

१. सायन
२. निरायन।

यहाँ पर निरायन सौरमास का गृहारंभ फल विचार किया गया है।

१. मेष : ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मेष मास में गृह निर्माण का फल शुभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को मेष मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए। 

२. वृष: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने वृष मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का धन वृद्धि होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में दक्षिण या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को वृष मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

३. मिथुन: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मिथुन मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का मृत्यु होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

४. कर्क: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कर्क मास में गृह निर्माण का फल शुभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कर्क मास मे  पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

५. सिंह: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने सिंह मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का सेवकों की वृद्धि होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कर्क मास मे  पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

६. कन्या: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कन्या मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रोग होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

७. तुला: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने तुला मास में गृह निर्माण का फल  गृहपति का सौख्य होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है।किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में  दक्षिण या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को तुला मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

८. वृश्चक: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार  ने वृश्चक मास में गृह निर्माण का फल धनवृद्धि होता हैं। विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक कहता है  इस मास में गृह निर्माण का फल धन धान्य वृद्धि है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को वृश्चक मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

९. धनु: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने धनु मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को महा हानि  होता हैं। विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक कहता है इस मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को हानि है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

१०. मकर: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मकर मास में गृह निर्माण का फल धन का आगमन होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है।किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को मकर मास मे पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

११. कुंभ: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कुंभ मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रत्न का लाभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कुंभ मास मे पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

१२. मीन: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मीन मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रोग होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है।

सौरचंद्रमास के अनुसार गृहारंभ फल:-

प्रश्न उठता है की सौर मास गृहारंभ फल और चंद्र मास गृहारंभ फल का विचार हम पहले कर चुके है। तो फिर सौरचंद्र मास गृहारंभ फल का विचार अलग से विचार करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर भारतीय पचांग मे है। हम सब जानते है, सौरवर्ष का गणना लगभग स्थिर है। किन्तु चंद्रवर्ष का गणना अस्थिर है। उसको सौरवर्षके साथ समानता करने के लिये कभी १ मास जोड़ना होता है तो कभी १ मास घटना होता है। दूसरा एक और कारण भी है हमारे यहाँ चन्द्रमास का गणना २ तरहा से होता है। 

१. शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गणना होता है।
२. कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से गणना होता है।

आचार्य रामदैवज्ञ अपनी पुस्तक मुहूर्त चिन्तामणि मे कहा है की यदि फाल्गुन मास मे रवि कुम्भ राशि मे है तो पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। यदि  श्रावण फाल्गुन मास मे रवि सिंह राशि मे है तो भी पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा पौष मासमे रवि मकर राशि मे है तो भी पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

आचार्य रामदैवज्ञ का कहना है यदि वैशाख मास मे रवि मेष राशि मे हो या वृष राशि मे हो तो दक्षिण और उत्तर मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा मार्गशीष मास मे रवि तुला राशि मे हो या वृश्चिक राशि मे हो तो दक्षिण और उत्तर मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

वास्तुरत्नावली मे श्रीपति के मत के नाम पर जो कुछ दिया गया है वह श्रीपति के मुहूर्तरत्नावली मे नहीं है। यह श्रीपति के और किसी साहित्य मे हो यह अभी कह नहीं सकता।

वास्तुरत्नावली मे यह भी कहा गेया है की किसी किसी आचार्य का मत मे चैत्र मास मे रवि मेष राशि मे स्थित है तो किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा ज्येष्ठ मास मे वृष राशि स्थित रवि, आषाढ मास मे कर्क राशि स्थित रवि, भाद्रपद मास मे सिंह राशि स्थित रवि, आश्विन मास मे तुला राशि स्थित रवि, कार्त्तिक मास मे वृश्चिक राशि स्थित रवि, पौष मास मे मकर राशि स्थित रवि और माघ मास मे कुम्भ राशि स्थित रवि मे भी किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

किन्तु कार्त्तिक मास मे कन्या राशि स्थित रवि मे गृह निर्माण करना शुभ नही होता। उसी तरहा माघ मास मे धनु राशि स्थित रवि, चैत्र मास मे मीन राशि स्थित रवि, ज्येष्ठ मास मे मिथुन राशि स्थित रवि, आषाढ मास मे भी मिथुन राशि स्थित रवि, भाद्रपद मास मे कन्या राशि स्थित रवि, पौष मास मे धनु राशि स्थित रवि और फाल्गुन मास मे कुम्भ राशि स्थित रवि रहने से किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण अशुभ होता है।

इसलिए जिस स्थान मे जो पंचांग का व्यवहार होता है, उसमे कोनसा चंद्रमास व्यवहार होता है, उसका सौरवर्ष के साथ मिलकर गृहारंभ फल का विचार करना चाहिए। 
                                                           
                                      उपस्कारक ग्रंथ सूची
१. ज्ञानप्रकाशदीपार्णव वास्तुशास्त्र : संपादक प्रभाशंकर ओघोड़ भाई सोमपुरा, पालीताणा, संस्करण १९६४ ई.।
२. मुहूर्तचिंतामणि : श्रीरामाचार्य कृत, पंडित महीधर शर्मा कृत भाषा टीका, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुम्बई, संस्करण २००४ ई.।
३. विश्वकर्मा प्रकाश: विश्वकर्माकृत, संपादक और अनुबाद मिहिरचंद खेमराज, श्रीकृष्णदास , मुम्बई, संस्करण २००४ ई.।
४.ज्योतिष निर्बंध: आनंद आश्रम संस्कृत ग्रंथ माला, पूना,(क्रम ८५ )संशोधक - रंगनाथ शास्त्री, और प्रकाशक विनायक गणेश आप्टे, संस्करण १९१९ ई.।
५. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ. निमाई बेनर्जी और रमेशचंद्र दाश, ज्ञानयुग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर, संस्करण २०१४ ई.।
६. ज्योतिषरत्नमाला : दैवज्ञ श्रीपतिभटाचार्य सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, परिमल प्रकाशन, दिल्ही, संस्करण २००४ ई.।
७. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, संस्करण २००६ ई.।
८. वास्तुराजवल्लभ : श्रीमण्डन मिश्र, सम्पादक एबं व्याख्याकार स्व. श्री अनूप मिश्र और रामयत्न शर्मा, मास्टर खेलाडीलाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई.।
९. वास्तुरत्नावली : श्री जीवनाथ शर्मा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार श्री अच्युतानंद झा, चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन ,वाराणसी,  संस्करण १९८१ ई.।

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