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Sunday, 3 February 2019

ब्रह्म यज्ञ

ब्रह्म यज्ञ पञ्च महायज्ञ में प्रथम हैं। यह दो भागों में विभाजित है - १. सन्ध्योपासना २. स्वाध्याय (वेद आदि सत् शास्त्र का अध्ययन करना।
इनमें सन्ध्योपासना को प्रथम करना चाहिए। ओर स्वाध्याय को अग्निहोत्र के पश्चात करना चाहिए।
स्वाध्याय शब्द का अर्थ :-  इस का दो प्रकार के अर्थ हैं।
१. स्व + अध्याय (स्वस्य अध्ययनम्) अर्थात अपने आप का अध्ययन करना।
२. सु +आ+अध्याय अर्थात सब उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन करना।
प्रथम प्रकार का स्वाध्याय सन्ध्योपासना के अन्तर्गत आ जाता है। दूसरी प्रकार का स्वाध्याय वेद आदि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन हो जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की प्राप्ति और वृद्धि होता है।

Sunday, 21 October 2018

वेदांग शिक्षा २

स्थानप्रकरणम्
तावत्  तत्र स्थानम्।१।
कण्ठ्याः अकवर्गहविसर्जनीयाः।२
एकेषां हविसर्जनियावुरस्याः ।३।
जिह्व्यो जिह्वामूलीयः।४।
ऋवर्ण कवर्गश्च जिह्व्यः एकेषाम् ।५।
एकेषां कवर्गावर्णानुस्वारजिह्वामूलीया जिह्वया।६।
एके सर्वमुखस्थानमवर्णमिति।७।
एके कण्ठ्यानास्यमात्रानिति।८। 
तालव्याः इचवर्गरशाः।९।
मूर्धन्याः ऋटवर्गरषाः।१०।
दुःस्पुष्टः अपि।११।
रेफो दन्तमूलीस्थानमेकेषाम्।१२।
दन्त्याः लृतवर्गलसाः।१३।
एकेषां दन्तमूलस्तु तवर्गः।१४।
दन्त्योष्ठ्यो वकारः।१५।
एकेषाम् सृक्किणीस्थानम्।१६।
ओष्ठ्याः उपूपध्मानीया।१७।
नासिक्याः अनुस्वारयमाः।१८।
नासिक्यः अपि।१९।
एकेषां कण्ठ्यनासिक्यमनुस्वारम्।२०।
एकेषां यमाश्च नासिक्य जिह्वामूलीयः।२१।
कण्ठतालव्यौ ए ऐ।२२।
कण्ठोष्ठ्यौ ओ औ।२३।
स्वस्थाननासिकास्थानाः ङञणनमाः।२४।
सन्ध्यक्षराणि द्विवर्णानि।२५।
सरेफ ऋवर्णः। २६।
सलकार लृवर्णः।२७।
एवमेतानि स्थानानि।२७।


करण प्रकारणम्
करणं अपि। १।
जिह्व्यतालव्यमूर्धन्यदन्त्यानां करणं जिह्वा। २।
जिह्व्यानां जिह्वामूलेन। ३।
तालव्यानां जिह्वामध्येन। ४।
मूर्धन्यानां जिह्वोपाग्रेण। ५।
करणं वा जिह्वाग्राधः। ६।
दन्तानां जिह्वाग्रेण। ७।
स्वस्थानकरणाः शेष वर्णाः। ८।
एतत् करणमिति।८।








वेदांग शिक्षा 1


अथ वर्णाः।१।
स्थानकरणप्रयत्नपरेभ्यो त्रिषष्टिः वर्णाः।२।
चतुःषष्टिः एकेषाम्। ३।
क्रम प्रकरणम्
अथातो वर्ण क्रमः।१।
तत्र स्वराः प्रथमम्।२।
अ आ आ३।३।
इ ई ई३।४।
उ ऊ ऊ३।५।
ऋ ॠ ॠ३ ।६।
ऌ ॡ३।७।
अथ सन्ध्यक्षराणि।७।
ए ए३।८।
ऐ ऐ३।९।
ओ ओ३।१०।
औ औ३।११।
इति सन्ध्यक्षराणि।१२।
इति स्वराः।१३।
अथ व्यञ्जनानि।१४।
तत्र स्पर्शाः प्रथमम्।१५।
क ख ग घ ङ कवर्गः।१६।
च छ ज झ ञ चवर्गः।१७।
ट ठ ड ढ ण टवर्गः।१८।
त थ द ध न तवर्गः।१९।
प फ ब भ म पवर्गः।२०।
इति स्पर्शाः।२१।
अथान्तःस्थाः।२२।
य र ल व।२३।
इति अन्तःस्थाः।२४।
अथोष्माणः।२५।
श ष स ह।२६।
अथोयोगवाहाः।२७।
ᳲक जह्वामुलियः।२८।
ᳲप उपध्मानीयः।२९।
इति उष्माणः। ३०। 
अः विसर्जनीयः।३१।
अं अनुस्वारः।३२।
कुँ खु़ँ खु़ँ घुँ यमाः।३३।
एते वर्णास्त्रिषष्टिः।३४।
हुँ नासिक्य एकेषाम्।३५। 
इति अयोगवाहाः। ३६।
ळ दुःस्पृष्टः एके।३७।
चतुःषष्टिरित्येके।३८। 
इति व्यञ्जनानि। ३९।
एष क्रम वर्णानामिति।४०।

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