जब पाकशाला में अन्न सिद्ध हो जाने पर उसमे से खट्टा, लवणान्न, क्षार अन्न, दालें को छोडकर शेष अन्न को हाथ की ब्रह्मतीर्थ से चूल्हे की अग्नि में निम्न मन्त्र से आहतियां दैं-
ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ धन्वन्तरये स्वाहा। इदं धन्वन्तरये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ विश्वेभ्योदेवेभ्यो स्वाहा। इदं विश्वेभ्योदेवेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये ( न मम) (इदं न मम) ॥ (मौनाहुति)
ॐ अग्नये स्वष्टकृते स्वाहा। इदमग्नये स्वष्टकृते ( न मम) (इदं न मम) ॥
अव बलि देने के पूर्व जहाँ जहाँ बलि देना होगा उस स्थान को झाडू से साफ कर देना चाहिए।
फिर से उस धृत मिश्रित अन्न को जहाँ जहाँ कहा गया है वहां वहां बलि दैं। बलि देने के पूर्व ओर पश्चात एक एक बार जल छिडके। पहले घर के बाहर चारो दिशाऔं मे बलि देना चाहिए
ॐ इन्द्राय नमः। इदमिन्द्राय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पूर्व में
ॐ यमाय नमः। इदं यमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ दक्षिण में
ॐ वरुणाय नमः। इदं वरुणाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पश्चिम में
ॐ सोमाय नमः। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ उत्तर में
ॐ महद्भ्यो नमः। इदं महद्भ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ मूख्य द्वार पर
ॐ गृहदेवताभ्यो नमः ॥ इदं गृहदेवताभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह में प्रवेश कर के गृह के भीतर
ॐ ब्रह्मणे नमः ॥ इदं ब्रह्मणे ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह के मध्य में
ॐ आकाशाय नमः ॥ इदं आकाशाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह से बाहर निकल कर आकाश की ओर
ॐ दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ यह घर के बाहर (दिन मे)
ॐ नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ बाहर (रात्रि मे)
फिर अपने आश्रित पशु ओर भिक्षु आदि को भोजन दे। गृह में स्थित अन्य लोगों को भोजन के बाद स्वयं भोजन करें।
Monday, 4 February 2019
बलि वैश्वदेव विधि
Sunday, 3 February 2019
ब्रह्म यज्ञ
इनमें सन्ध्योपासना को प्रथम करना चाहिए। ओर स्वाध्याय को अग्निहोत्र के पश्चात करना चाहिए।
१. स्व + अध्याय (स्वस्य अध्ययनम्) अर्थात अपने आप का अध्ययन करना।
२. सु +आ+अध्याय अर्थात सब उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन करना।
प्रथम प्रकार का स्वाध्याय सन्ध्योपासना के अन्तर्गत आ जाता है। दूसरी प्रकार का स्वाध्याय वेद आदि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन हो जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की प्राप्ति और वृद्धि होता है।
Saturday, 26 January 2019
सन्ध्योपासन विधि
सन्ध्योपासना मनुष्यमात्रके लिये परम आवश्यक कर्म है। इसके विना पञ्चमहायज्ञ करने की योग्यता नहीं आती। अतः प्रत्येक मनुष्य को सन्ध्या करना आवश्यक है।
स्नान के पश्चात दो वस्त्र धारण करके पूर्व, उत्तर या ईशान कोण की ओर मुख कर आसन पर वैठ जाये। आसन की ग्रन्थि आपकी मुख की दिशा से ९०ं कोण मैं रहना चहिये।
सन्ध्याके लिये पात्र
१. आसन १
२. लोटा प्रधान जलपात्र १
३. आचमनी १
४. पञ्चपात्र १
५. प्रक्षालन पात्र १
सन्ध्योपासना आरम्भ करने से पूर्व उसकी तैयारी के लिए निम्न कार्य को करनी चहियें -
१. आचमन (विना मन्त्र के)
२. प्राणायाम (विना मन्त्र के)
शिखाबन्धन
अव गायत्रीमन्त्र का पाठ करके सुपथगामी बुद्धि की प्रार्थना करता हुआ शिखाबन्धन करें।
सावित्री मन्त्रः, विश्वामित्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, सविता देवता, शिखाबन्धने विनियोगः
ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात् ॥ ऋ. १०।९।४ ॥
आचमन मन्त्र
अव वाये हस्त से पञ्चपात्र से जल आचमनी से लेकर दक्षिण हस्तमैं जल लेकर निम्न मन्त्र से बह्मतीर्थ से ३ वार आचमन करें।
ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥ ऋ. १०।९।४, यजु. ३६।१२
पश्चात अंगुठे के मूल से मुख को पोछने चाहिए। आव आचमनी से थोडा जल लेकर प्रक्षालन पात्र मैं हस्थ को धो लैं।
अङ्गस्पर्श मन्त्र
अब दाहिना हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से बाई हथेली में थोडा जल लेकर दाहिने हाथ अंगुलियों से जल के द्वारा स्पर्श करते हुए इन्द्रियों की स्थिरता एवं दृढ़ता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करे।
ॐ वाक् वाक् ॥ (दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका से मुख मे)
ॐ प्राणः प्राणः ॥ (दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठे से नासिका के दो छिद्र मे)
ॐ चक्षुः चक्षुः ॥ (दाहिने हाथ की मध्यमा और अंगुष्ठे से दोनों आँखों मे)
ॐ श्रोत्रं श्रोत्रम्। ॥ (दाहिने हाथ की अनामिका और अंगुष्ठे से दोनों कानो मे)
ॐ नाभिः ॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर नाभि पर)
ॐ हृदयम्॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर हृदय पर)
ॐ कण्ठः॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर कण्ठ)
ॐ शिरः। (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर शिर पर)
ॐ बाहुभ्यां यशोबलम्। (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर दोनों भुजाओ मे)
ॐ करतलकरपृष्ठे ॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर वाम हाथ के उपर ओर नीचे )
( फिर वाम हाथ का जल दाहिने हाथ में लेकर वाम हाथों की पञ्च अंगुलियों को आपस में मिला कर दाहिने हाथ के उपर ओर नीचे)
उस जलको पक्षालन पात्र मैं डाल दैं। पुन दाहिना हाथ से आचमनी पात्र से चमास के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो लैं।
मार्जन मन्त्र
फिर बाम हाथ की हथेली पर जल लेकर दाहिने हाथ की मध्यमा अनामिका ओर अगूंठे से, अथवा कुशाओं से उन अङ्गों पर जल छींटते हुए निम्न मंत्र से ईश्वर से उन अङ्गों की शुद्धि के लिए प्रार्थना करे
ॐ भूः पुनातु शिरसि। इससे शिर पर।
ॐ भुवः पुनातु नेत्रयोः। इससे दोनों नेत्रों पर।
ॐ स्वः पुनातु कण्ठे। इससे कण्ठ पर।
ॐ महः पुनातु हृदये। इससे हृदय पर।
ॐ जनः पुनातु नाभ्याम्। इससे नाभि पर।
ॐ तपः पुनातु पादयोः। इससे दोनों पैरों पर।
ॐ सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि। इससे शिर पर।
ॐ खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥इससे समस्त शरीर पर।
अव उस वाम हाथ का जलको पक्षालन पात्र मैं डाल दैं।
प्राणायाम मन्त्र
ॐ भूः। ॐ भुवः॑। ॐ स्वः॑। ॐ महः॑। ॐ जनः॑। ॐ तपः॑। ॐ स॒त्यम् । ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात् ॥ ॐआपो॒ ज्योती॒ रसो॒ऽमृतं ब्रह्म॒ भूर्भुवस्सुव॒रोम्॥. तै. आ. १०।२७
आचमन मन्त्र
अव वाये हस्त से पञ्चपात्र से जल आचमनी से लेकर दक्षिण हस्तमैं जल लेकर निम्न मन्त्र से बह्मतीर्थ से ३ वार आचमन करें।
ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥ ऋ. १०।९।४, यजु. ३६।१२
पश्चात अंगुठे के मूल से मुख को पोछने चाहिए। आव आचमनी से थोडा जल लेकर प्रक्षालन पात्र मैं हस्थ को धो लैं। इस आचमन से प्राणायाम से उत्पन्न उष्णता शान्त होता है। शास्त्रकारों ने प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आचमन का विधान किया है।
अधमर्षण मन्त्र
निम्न मंत्रों के माध्यम से प्रभु की व्यापकता, शक्तिमत्ता एवम् सृष्टि रचना का चिन्तन करते हुए रात्रि में किये हुए पापों प्रातःकाल मैं ओर दिन में किये गये पापों का सायङ्काल मे दूरीकरण के लिए प्रार्थना करना चाहिए।
ॐ ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्यजायत। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्णवः ॥
स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अजायत। अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिषतो वशी ॥
सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापूर्वम॑कल्पयत् ।दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑ ॥ ऋ. १०।१९०।१-३
मनसा परिक्रमा मन्त्र
अपने मन को निम्न मंत्र से चार ओर ईश्वर की विभिन्न शक्तियों ओर कार्य का बोध कराता हुआ धुमा फिरा कर ओर थकाकर उस ईश्वर में स्थिर करें -
ॐ प्राची॒ दिग॒ग्निरधि॑पतिरसि॒तो र॑क्षि॒तादि॒त्या इष॒वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑पति॒स्तिर॑श्चिराजी रक्षा॒ता पि॒तर इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
प्र॒तीची॒ दिग्वरु॒णोऽधि॑पतिः॒ पृदा॑कू रक्षि॒तान्नमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑पतिः स्वजो र॑क्षि॒ताशनि॒रिष॑वः । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
ध्रु॒वा दिग् विष्णु॒रधि॑पतिः क॒ल्मष॑ग्रीवो रक्षि॒ता वी॒रुध॒ इष॑वः॒ । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
ऊ॒र्ध्वा दिग् बृह॒स्पति॒रधि॑पतिः श्वित्रो रक्षि॒ता व॒र्षमिष॑वः । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥ अथर्व ३।२७।१-६
उपस्थान मन्त्र
अव ईश्वर के अपने सब ओर जान कर निम्न मंत्र से अर्थ विचार पूर्वक ईश्वर के गोद में बैठा हुआ अनुभव करें -
ॐ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः᳕ पश्यन्त॒ उत्तरम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥ यजु ३५।१४
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ॥ यजु ३३।३१
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अन्तरि॑क्षꣳ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च ॥ यजु ७।४२
तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑त पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत् । पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तꣳ श्रृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्र ब्रवाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात् ॥ यजु ३६।२४
गुरु मंत्रः
निम्न मंत्र को यथाशक्ति बार, १० वार, २८ बार अथवा १०८ बार अर्थ विचार पूर्वक मानसिक जप करें।
ॐ भूर्भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्। ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात् ॐ॥
अथ समर्पण
निम्न वाक्य से अपनी अहंकार की निवृत्ति के लिए किया गया सन्ध्योपासना कर्म को ईश्वर को समर्पित करे (आचमनी मे जल लेकर निम्न वाक्य बोलकर पृथ्वी पर जल छोडे। ) -
हे ईश्वर दयानिधे! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धर्भवेन्नः ॥
सर्वं श्रीपरमेश्वरार्पणमस्तु॥ ( जल मस्तक मे लगाये)
नमस्कार मन्त्र
उपासना के अन्त में दोनों हाथों को जोड़ कर निम्न मंत्र से नमस्कार करे।
ॐ नमः॑ शम्भ॒वाय॑ च मयोभ॒वाय॑ च॒ नमः॑ शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॥ यजु १६।४१
Sunday, 21 October 2018
वेदांग शिक्षा २
तावत् तत्र स्थानम्।१।
कण्ठ्याः अकवर्गहविसर्जनीयाः।२
एके सर्वमुखस्थानमवर्णमिति।७।
एके कण्ठ्यानास्यमात्रानिति।८।
मूर्धन्याः ऋटवर्गरषाः।१०।
रेफो दन्तमूलीस्थानमेकेषाम्।१२।
एकेषां दन्तमूलस्तु तवर्गः।१४।
दन्त्योष्ठ्यो वकारः।१५।
एकेषाम् सृक्किणीस्थानम्।१६।
ओष्ठ्याः उपूपध्मानीया।१७।
नासिक्याः अनुस्वारयमाः।१८।
नासिक्यः अपि।१९।
एकेषां कण्ठ्यनासिक्यमनुस्वारम्।२०।
एकेषां यमाश्च नासिक्य जिह्वामूलीयः।२१।
कण्ठतालव्यौ ए ऐ।२२।
कण्ठोष्ठ्यौ ओ औ।२३।
स्वस्थाननासिकास्थानाः ङञणनमाः।२४।
सन्ध्यक्षराणि द्विवर्णानि।२५।
सरेफ ऋवर्णः। २६।
एवमेतानि स्थानानि।२७।
करण प्रकारणम्
वेदांग शिक्षा 1
ऋ ॠ ॠ३ ।६।
ऌ ॡ३।७।
अथ सन्ध्यक्षराणि।७।
ए ए३।८।
ऐ ऐ३।९।
ओ ओ३।१०।
औ औ३।११।
इति स्वराः।१३।
च छ ज झ ञ चवर्गः।१७।
ट ठ ड ढ ण टवर्गः।१८।
त थ द ध न तवर्गः।१९।
प फ ब भ म पवर्गः।२०।
इति स्पर्शाः।२१।
अथान्तःस्थाः।२२।
य र ल व।२३।
अथोष्माणः।२५।
श ष स ह।२६।
अथोयोगवाहाः।२७।
ᳲक जह्वामुलियः।२८।
ᳲप उपध्मानीयः।२९।
एते वर्णास्त्रिषष्टिः।३४।
हुँ नासिक्य एकेषाम्।३५।
Monday, 26 March 2018
अग्निहोत्र विधि
१८. स्रुच -१
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा॥ २ । इससे दूसरा।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयातं स्वाहा॥ ३। इससे तीसरा।
इसके वाद दो वार अंगूठे के मूल से ओठों को पोछे , फिर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो डाले।
ॐ नसोर्मे प्राणऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठे से नासिका के दो छिद्र मे)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षरस्तु॥ (दाहिने हाथ की मध्यमा और अंगुष्ठे से दोनों आँखों मे)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु॥ (दाहिने हाथ की अनामिका और अंगुष्ठे से दोनों कानो मे)
ॐ बाह्वर्मे बलमस्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर दोनों भुजाओ मे)
ॐ उर्वोर्मे ओजोऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर जांघो मे)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनुम्तन्वा मे सह सन्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर पूरा शरीर मे)
इस मन्त्र का उच्चारण करके कपूर को अग्निपात्र मे रखकर उसमे छोटी छोटी लकड़ी लगाके यजमान उस पात्र को हाथों से उठाकर यदि गर्म होतो अग्निपात्र को चिमटे से पकड़कर खड़े हो कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे।
ॐ भूर्भुवः॒ स्व᳕र्द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा । तस्या॑स्ते पृथिवी देवयजनि पृ॒ष्ठे᳕ऽग्निम॑न्ना॒दम॒न्नाद्या॒या द॑धे ॥ (यजु अ ३। म. ५)
ॐ ॐ उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि॒ त्वमि॑ष्टापू॒र्ते सᳬंसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ अध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत ॥(यजु अ १५ । म. ५४ )
ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व॥ इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥ इस मन्त्र से उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐ देव॑ सावितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।
ॐ इन्द्राय स्वाहा॥ इदं इन्द्राय (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस मंत्र से अग्नि के मध्य उत्तर में आहुति दे।
(इस मंत्र से दोनों आधार को अग्नि के मध्य में पश्चिम से पूर्व की और सीधा रेखा में देना चाहिए। मध्य में आज्य की धारा ना टूटनी चाहिए ना आपस में मिलाना चाहिए।)
ॐ सोमाय स्वाहा॥ इदं सोमाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के दक्षिण भाग की अग्नि में या ईशान कोण में आहुति दे।
ॐ सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जूरु॒षेसेन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णः सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहा॑॑क॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अग्निर्वर्चो योतिर्वर्चो स्वाहा ॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑रग्निः॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(मौन आहुति )
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जू रात्र्येन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णोऽअ॒ग्निर्वे॑तु॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
उभय कालीन आहुतिया
ॐ भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा॥ इदं वायवेऽपानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥इदमादित्याय व्यानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। २ )
ॐ आपो ज्योतिरसो मृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा ॥ इदमद्भ्यो ज्योतिषे रसायामृताय ब्रह्मणे (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। १५ )
ॐ यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते । तया॒ माम॒द्य मे॒धायाऽग्ने॑ मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३२ ।म. १४ )
ॐ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव ।यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व॒ स्वाहा॑ ॥ इदं (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३० ।म. ३ )
ॐ अदितेऽनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से पूर्व में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ अनुमतेऽनुमंस्थाः॥इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐदेव॑ सावितः॒ प्रासा॑वी य॒ज्ञं प्रासा॑वी य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।
उस के वाद प्रदक्षिण द्वारा यज्ञकुण्ड के अग्नि को परिक्रमा ३ वार करे।
इस प्रकार अग्निहोत्र विधि या देवयज्ञ विधि समाप्त होता है।
Saturday, 1 July 2017
गृह वास्तु का ९ सूत्र
मेरा अगला ब्लॉग होगा वास्तु से ब्रह्म ज्ञान
Shiva Temple: Material & Practical Lessons (Adhibhautik)
Introduction Shiva temples are not only spiritual centers—they also offer practical lessons for daily life . While the Adhyatmik aspect ...
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