Monday, 4 February 2019

बलि वैश्वदेव विधि

जब पाकशाला में अन्न सिद्ध हो जाने पर उसमे से खट्टा, लवणान्न, क्षार अन्न, दालें को छोडकर शेष अन्न को हाथ की ब्रह्मतीर्थ से चूल्हे की अग्नि में निम्न  मन्त्र से आहतियां दैं-
ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ धन्वन्तरये स्वाहा। इदं धन्वन्तरये ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ विश्वेभ्योदेवेभ्यो स्वाहा। इदं विश्वेभ्योदेवेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥
ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये ( न मम) (इदं न मम) ॥ (मौनाहुति)
ॐ अग्नये स्वष्टकृते स्वाहा। इदमग्नये स्वष्टकृते  ( न मम) (इदं न मम) ॥
अव बलि देने के पूर्व जहाँ जहाँ बलि देना होगा उस स्थान को झाडू से साफ कर देना चाहिए।
फिर से उस धृत मिश्रित अन्न को जहाँ जहाँ कहा गया है वहां वहां बलि दैं। बलि देने के पूर्व ओर पश्चात एक एक बार जल छिडके। पहले घर के बाहर चारो दिशाऔं मे बलि देना चाहिए
इन्द्राय नमः। इदमिन्द्राय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पूर्व में
ॐ यमाय नमः। इदं यमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ दक्षिण में
वरुणाय नमः। इदं वरुणाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ पश्चिम में
ॐ सोमाय नमः। इदं सोमाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ उत्तर में
महद्भ्यो नमः। इदं महद्भ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ मूख्य द्वार पर
ॐ गृहदेवताभ्यो नमः ॥ इदं गृहदेवताभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह में प्रवेश कर के गृह के भीतर
ॐ ब्रह्मणे नमः ॥ इदं ब्रह्मणे ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह के मध्य में
आकाशाय नमः ॥ इदं आकाशाय ( न मम) (इदं न मम) ॥ गृह से बाहर निकल कर आकाश की ओर
ॐ दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥ यह घर के बाहर (दिन मे)
नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो नमः ॥ इदं नक्तंचारिभयो भूतेभ्यो ( न मम) (इदं न मम) ॥  बाहर (रात्रि मे)
फिर अपने आश्रित पशु ओर भिक्षु आदि को भोजन दे। गृह में स्थित अन्य लोगों को भोजन के बाद स्वयं भोजन करें।

Sunday, 3 February 2019

ब्रह्म यज्ञ

ब्रह्म यज्ञ पञ्च महायज्ञ में प्रथम हैं। यह दो भागों में विभाजित है - १. सन्ध्योपासना २. स्वाध्याय (वेद आदि सत् शास्त्र का अध्ययन करना।
इनमें सन्ध्योपासना को प्रथम करना चाहिए। ओर स्वाध्याय को अग्निहोत्र के पश्चात करना चाहिए।
स्वाध्याय शब्द का अर्थ :-  इस का दो प्रकार के अर्थ हैं।
१. स्व + अध्याय (स्वस्य अध्ययनम्) अर्थात अपने आप का अध्ययन करना।
२. सु +आ+अध्याय अर्थात सब उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन करना।
प्रथम प्रकार का स्वाध्याय सन्ध्योपासना के अन्तर्गत आ जाता है। दूसरी प्रकार का स्वाध्याय वेद आदि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन-मनन हो जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की प्राप्ति और वृद्धि होता है।

Saturday, 26 January 2019

सन्ध्योपासन विधि

सन्ध्योपासना मनुष्यमात्रके लिये परम आवश्यक कर्म है। इसके विना पञ्चमहायज्ञ करने की योग्यता नहीं आती। अतः प्रत्येक मनुष्य को सन्ध्या करना आवश्यक है।
स्नान के पश्चात दो वस्त्र धारण करके पूर्व, उत्तर या ईशान कोण की ओर मुख कर आसन पर वैठ जाये। आसन की ग्रन्थि आपकी मुख की दिशा से ९०ं कोण मैं रहना चहिये।

सन्ध्याके लिये पात्र
१. आसन १
२. लोटा प्रधान जलपात्र १
३. आचमनी १
४. पञ्चपात्र १
५. प्रक्षालन पात्र १

सन्ध्योपासना आरम्भ करने से पूर्व उसकी तैयारी के लिए निम्न कार्य को करनी चहियें -
१. आचमन (विना मन्त्र के)
२. प्राणायाम (विना मन्त्र के)

                    शिखाबन्धन
अव गायत्रीमन्त्र का पाठ करके सुपथगामी बुद्धि की प्रार्थना करता हुआ शिखाबन्धन करें।

सावित्री मन्त्रः, विश्वामित्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, सविता देवता, शिखाबन्धने विनियोगः

ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात् ॥ ऋ. १०।९।

                    आचमन मन्त्र
अव वाये हस्त से पञ्चपात्र से जल आचमनी से लेकर दक्षिण हस्तमैं जल लेकर निम्न मन्त्र से बह्मतीर्थ से ३ वार आचमन करें।
ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥  ऋ. १०।९।, यजु. ३६।१२
पश्चात अंगुठे के मूल से  मुख को पोछने चाहिए। आव आचमनी से थोडा जल लेकर प्रक्षालन पात्र मैं हस्थ को धो लैं।

                  अङ्गस्पर्श मन्त्र
अब दाहिना हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से बाई हथेली में थोडा जल लेकर दाहिने हाथ अंगुलियों से जल के द्वारा स्पर्श करते हुए इन्द्रियों की स्थिरता एवं दृढ़ता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करे। 

ॐ वाक् वाक् ॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अनामिका से मुख मे)
ॐ प्राणः प्राणः ॥ (दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठे से नासिका के दो छिद्र मे)
ॐ चक्षुः चक्षुः ॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अंगुष्ठे से दोनों आँखों मे)
ॐ श्रोत्रं श्रोत्रम्। ॥ (दाहिने हाथ की  अनामिका और अंगुष्ठे से दोनों कानो मे)
ॐ नाभिः ॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर नाभि पर)
ॐ हृदयम्॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर हृदय पर)
ॐ कण्ठः॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर कण्ठ)
ॐ शिरः। (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर शिर पर)
ॐ बाहुभ्यां यशोबलम्। (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर दोनों भुजाओ मे)
ॐ करतलकरपृष्ठे ॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर वाम हाथ के उपर ओर नीचे )
( फिर वाम हाथ का जल दाहिने हाथ में लेकर वाम हाथों की पञ्च अंगुलियों को आपस में मिला कर दाहिने हाथ के उपर ओर नीचे)
उस जलको पक्षालन पात्र मैं डाल दैं। पुन दाहिना हाथ से आचमनी पात्र से चमास के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो लैं।

                   मार्जन मन्त्र
फिर बाम हाथ की हथेली पर जल लेकर दाहिने हाथ की मध्यमा अनामिका ओर अगूंठे से, अथवा कुशाओं से उन अङ्गों पर जल छींटते हुए निम्न मंत्र से ईश्वर से उन अङ्गों की शुद्धि के लिए प्रार्थना करे
ॐ भूः पुनातु शिरसि। इससे शिर पर।
ॐ भुवः पुनातु नेत्रयोः। इससे दोनों नेत्रों पर।
ॐ स्वः पुनातु कण्ठे। इससे कण्ठ पर।
ॐ महः पुनातु हृदये। इससे हृदय पर।
ॐ जनः पुनातु नाभ्याम्। इससे नाभि पर।
ॐ तपः पुनातु पादयोः। इससे दोनों पैरों पर।
ॐ सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि। इससे शिर पर।
ॐ खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥इससे समस्त शरीर पर।
अव उस वाम हाथ का जलको पक्षालन पात्र मैं डाल दैं।
    
                       प्राणायाम मन्त्र

पूरक-प्राणायामः--
इसमें दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिनी नाक को बन्दकर बायीं नासिका से श्वास को भीतर खींचे। इसे पूरक प्राणायाम कहते हैं। 

कुम्भक-प्राणायामः--
इसमें नाक के वायें छिद्र को भी वन्दकर भीतर में खींचे हुए वायुको धारण करे । इसे कुम्भक प्राणायाम कहते हैं ।

रेचक-प्राणायामः--
इसमें धारण किये हुए वायु को दाहिनी नासिका के छिद्र से धीरे धीरे वाहर छोड़ें। इसे रेचक प्राणायाम कहते हैं। 

पूरक (१ प्राणायाम मन्त्र का मानसिक जप करते हुए श्वास लेना)
कुम्भक (१ श्वास रोककर प्राणायाम मन्त्र  का जप करना)
रे क (१ प्राणायाम मन्त्र  का मानसिक क जप करते हुए श्वास को छोड़ना)

ॐ भूः। ॐ भुवः॑। ॐ स्वः॑। ॐ महः॑। ॐ जनः॑। ॐ तपः॑। ॐ स॒त्यम् ।  ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात् ॥ ॐआपो॒ ज्योती॒ रसो॒ऽमृतं ब्रह्म॒ भूर्भुवस्सुव॒रोम्॥. तै. आ. १०।२७
 
                       आचमन मन्त्र
अव वाये हस्त से पञ्चपात्र से जल आचमनी से लेकर दक्षिण हस्तमैं जल लेकर निम्न मन्त्र से बह्मतीर्थ से ३ वार आचमन करें।
ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥  ऋ. १०।९।, यजु. ३६।१२
पश्चात अंगुठे के मूल से  मुख को पोछने चाहिए। आव आचमनी से थोडा जल लेकर प्रक्षालन पात्र मैं हस्थ को धो लैं। इस आचमन से प्राणायाम से उत्पन्न उष्णता शान्त होता है। शास्त्रकारों ने प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आचमन का विधान किया है।
                    अधमर्षण मन्त्र
निम्न मंत्रों के माध्यम से प्रभु की व्यापकता, शक्तिमत्ता एवम् सृष्टि रचना का चिन्तन करते हुए रात्रि में किये हुए पापों प्रातःकाल मैं ओर दिन में किये गये पापों का सायङ्काल मे दूरीकरण के लिए प्रार्थना करना चाहिए।
ॐ ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्यजायत। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्णवः ॥
स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अजायत। अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिषतो वशी ॥
सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापूर्वम॑कल्पयत् ।दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑ ॥ ऋ. १०।१९०।१-३

                   मनसा परिक्रमा मन्त्र
अपने मन को निम्न मंत्र से चार ओर ईश्वर की विभिन्न शक्तियों ओर कार्य का बोध कराता हुआ धुमा फिरा कर ओर थकाकर उस ईश्वर में स्थिर करें -
ॐ प्राची॒ दिग॒ग्निरधि॑पतिरसि॒तो र॑क्षि॒तादि॒त्या इष॒वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑पति॒स्तिर॑श्चिराजी रक्षा॒ता पि॒तर इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
प्र॒तीची॒  दिग्वरु॒णोऽधि॑पतिः॒ पृदा॑कू रक्षि॒तान्नमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑पतिः स्वजो र॑क्षि॒ताशनि॒रिष॑वः । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
ध्रु॒वा दिग् विष्णु॒रधि॑पतिः क॒ल्मष॑ग्रीवो रक्षि॒ता वी॒रुध॒ इष॑वः॒ । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥
ऊ॒र्ध्वा दिग् बृह॒स्पति॒रधि॑पतिः श्वित्रो रक्षि॒ता व॒र्षमिष॑वः । तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः ॥ अथर्व ३।२७।१-६

              उपस्थान मन्त्र
अव ईश्वर के अपने सब ओर जान कर निम्न मंत्र से अर्थ विचार पूर्वक ईश्वर के गोद में बैठा हुआ अनुभव करें -
ॐ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः᳕ पश्यन्त॒ उत्तरम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥ यजु ३५।१४
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ॥ यजु ३३।३१
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अन्तरि॑क्षꣳ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च ॥ यजु ७।४२
तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑त पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत् । पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तꣳ श्रृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्र ब्रवाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात् ॥ यजु ३६।२४

                    गुरु मंत्रः

निम्न मंत्र को यथाशक्ति बार, १० वार, २८ बार अथवा १०८ बार  अर्थ विचार पूर्वक मानसिक जप करें।
ॐ भूर्भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्। ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒द॑यात्  ॐ॥

                   अथ समर्पण
निम्न वाक्य से अपनी अहंकार की निवृत्ति के लिए किया गया सन्ध्योपासना कर्म को ईश्वर को समर्पित करे (आचमनी मे जल लेकर निम्न वाक्य बोलकर पृथ्वी पर जल छोडे। ) - 

हे ईश्वर दयानिधे! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धर्भवेन्नः ॥

 सर्वं श्रीपरमेश्वरार्पणमस्तु॥ ( जल  मस्तक मे लगाये)  

                    नमस्कार मन्त्र

उपासना के अन्त में दोनों हाथों को जोड़ कर निम्न मंत्र से नमस्कार करे।
ॐ नमः॑ शम्भ॒वाय॑ च मयोभ॒वाय॑ च॒ नमः॑ शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॥ यजु १६।४१

Sunday, 21 October 2018

वेदांग शिक्षा २

स्थानप्रकरणम्
तावत्  तत्र स्थानम्।१।
कण्ठ्याः अकवर्गहविसर्जनीयाः।२
एकेषां हविसर्जनियावुरस्याः ।३।
जिह्व्यो जिह्वामूलीयः।४।
ऋवर्ण कवर्गश्च जिह्व्यः एकेषाम् ।५।
एकेषां कवर्गावर्णानुस्वारजिह्वामूलीया जिह्वया।६।
एके सर्वमुखस्थानमवर्णमिति।७।
एके कण्ठ्यानास्यमात्रानिति।८। 
तालव्याः इचवर्गरशाः।९।
मूर्धन्याः ऋटवर्गरषाः।१०।
दुःस्पुष्टः अपि।११।
रेफो दन्तमूलीस्थानमेकेषाम्।१२।
दन्त्याः लृतवर्गलसाः।१३।
एकेषां दन्तमूलस्तु तवर्गः।१४।
दन्त्योष्ठ्यो वकारः।१५।
एकेषाम् सृक्किणीस्थानम्।१६।
ओष्ठ्याः उपूपध्मानीया।१७।
नासिक्याः अनुस्वारयमाः।१८।
नासिक्यः अपि।१९।
एकेषां कण्ठ्यनासिक्यमनुस्वारम्।२०।
एकेषां यमाश्च नासिक्य जिह्वामूलीयः।२१।
कण्ठतालव्यौ ए ऐ।२२।
कण्ठोष्ठ्यौ ओ औ।२३।
स्वस्थाननासिकास्थानाः ङञणनमाः।२४।
सन्ध्यक्षराणि द्विवर्णानि।२५।
सरेफ ऋवर्णः। २६।
सलकार लृवर्णः।२७।
एवमेतानि स्थानानि।२७।


करण प्रकारणम्
करणं अपि। १।
जिह्व्यतालव्यमूर्धन्यदन्त्यानां करणं जिह्वा। २।
जिह्व्यानां जिह्वामूलेन। ३।
तालव्यानां जिह्वामध्येन। ४।
मूर्धन्यानां जिह्वोपाग्रेण। ५।
करणं वा जिह्वाग्राधः। ६।
दन्तानां जिह्वाग्रेण। ७।
स्वस्थानकरणाः शेष वर्णाः। ८।
एतत् करणमिति।८।








वेदांग शिक्षा 1


अथ वर्णाः।१।
स्थानकरणप्रयत्नपरेभ्यो त्रिषष्टिः वर्णाः।२।
चतुःषष्टिः एकेषाम्। ३।
क्रम प्रकरणम्
अथातो वर्ण क्रमः।१।
तत्र स्वराः प्रथमम्।२।
अ आ आ३।३।
इ ई ई३।४।
उ ऊ ऊ३।५।
ऋ ॠ ॠ३ ।६।
ऌ ॡ३।७।
अथ सन्ध्यक्षराणि।७।
ए ए३।८।
ऐ ऐ३।९।
ओ ओ३।१०।
औ औ३।११।
इति सन्ध्यक्षराणि।१२।
इति स्वराः।१३।
अथ व्यञ्जनानि।१४।
तत्र स्पर्शाः प्रथमम्।१५।
क ख ग घ ङ कवर्गः।१६।
च छ ज झ ञ चवर्गः।१७।
ट ठ ड ढ ण टवर्गः।१८।
त थ द ध न तवर्गः।१९।
प फ ब भ म पवर्गः।२०।
इति स्पर्शाः।२१।
अथान्तःस्थाः।२२।
य र ल व।२३।
इति अन्तःस्थाः।२४।
अथोष्माणः।२५।
श ष स ह।२६।
अथोयोगवाहाः।२७।
ᳲक जह्वामुलियः।२८।
ᳲप उपध्मानीयः।२९।
इति उष्माणः। ३०। 
अः विसर्जनीयः।३१।
अं अनुस्वारः।३२।
कुँ खु़ँ खु़ँ घुँ यमाः।३३।
एते वर्णास्त्रिषष्टिः।३४।
हुँ नासिक्य एकेषाम्।३५। 
इति अयोगवाहाः। ३६।
ळ दुःस्पृष्टः एके।३७।
चतुःषष्टिरित्येके।३८। 
इति व्यञ्जनानि। ३९।
एष क्रम वर्णानामिति।४०।

Monday, 26 March 2018

अग्निहोत्र विधि

अग्निहोत्र विधि 
अव हम नित्यकर्म का तृतीय प्रश्न का उत्तर देते है।

पञ्चभू संस्कार 
पञ्चभू संस्कार जिसे प्राचीन गृह सूत्र मे लक्षणवृत भी कहते है उसको सभी संस्कारादि मै अग्नि स्थापना करना से पूर्व करना चाहिये। यह इसप्रकार है :
१. यज्ञकुण्ड में स्थित धूलि को साफ करना। 
२. कुण्ड को गोबर और जल से लीपना। 
३. व्रज (जो  काष्ठ का खंड होता है ) या उसके आभाव मे स्रुवमुल से यज्ञकुण्ड के बरावर तीन रेखाये पूर्व से उत्तर तक खींचना चाहिये। 
४.  व्रजसे खींची गई रेखाओं से मिट्टी को अङ्गुष्ठा और अनामिका से  अलग करे। 
५. जल से यज्ञकुण्ड को छिडके। 
अग्निहोत्र पात्र 
१. स्रुव -२
२. आज्यस्थाली -२ 
३. प्रोक्षणी -१ 
४. प्रणिता -१ 
५. पञ्च पात्र और आचमनी-२ (यह गृह के जितना लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक )
६. अग्निपात्र -१ 
७. चिमिटा -१ 
८. वज्र -१ 
९. आसान -२ (यह गृह के जितना लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक )
१०. कुशा 
११. जल 
१२. आज्य 
१३. अखण्डित चावल 
१४. समिधा की एक टोकरी 
१५. चुल्ला 
१६. चावल रखने केलिए वड़ा पात्र (वड़ा तन्दुल पात्र )
१७. छोटेतन्दुल पात्र (यजमान और यजमान की पत्नी को छोड़ अन्य लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक)
१८. स्रुच -१ 
१९. प्रक्षालन पात्र १
कुछ सामान्य नियम 
१. अखण्डित चावल को वड़ा तन्दुल पात्र में पानी लेकर तीन वार जल मे धोना चाहिए। 
२. फिर उसमे कुछ घी उसमे मिलाना चाहिए। 
३. फिर उसको छोटेतन्दुल पात्रमे थोडा थोडा रखना चाहिए।
४. स्रुव और प्रोक्षणी को साफ करके अपनी दाहिने भाग मे रखे। 
५. आज्य को आज्यस्थाली मे लेकर चुल्ला मे गरम कर लेना चाहिए। अगर आज्य मे कुछ गिरा होतो कुशा से निकल देना चाहिए। 
६. उसी तरह प्रणिता मे जल लेकर यज्ञकुण्ड के पास रखना चाहिए। 
७. पञ्चपात्रमे थोडा थोडा जल रखना चाहिए। 
८. यजमान और यजमान की पत्नी दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम दिशा मे बैठे। वाकी सब यज्ञकुण्ड के चारो और बैठे जाये। 
दीपक प्रज्वलन मन्त्र 
ॐ अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृत्विज॑म् । होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ॥ १. १. १. 
इस मन्त्र से सवसे पहले अग्निको दियासिलाई से दीपक को प्रज्वलित करे। और उसको यज्ञकुण्ड के आग्नेय कोण के पास रख ले। 
आचमन मन्त्र 
सबसे पहले निम्न मन्त्रो से अर्थ विचारपूर्वक तीन आचमन करें। अब बाई हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से दाहिना हाथेली में उतना जल लेना चाहिए जितना कण्ठ से नीचे छति तक पहुंचे। उसेसे अधिक या कम नहीं लेना चाहिए।
इसको हाथ के बह्मतीर्थ से ग्रहण करना चाहिए। ग्रहण करते समये किसी भी तरह की शब्द नहीं होना चाहिए। 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥ १। इससे प्रथम।
ॐ अमृतापिधानमसि  स्वाहा २ । इससे दूसरा।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयातं  स्वाहा॥ ३।  इससे तीसरा।
इसके वाद दो वार अंगूठे के मूल से ओठों को पोछे , फिर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो डाले।
अंग स्पर्श मंत्र 
अब दाहिना हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर दाहिने हाथ अंगुलियों से जल के द्वारा स्पर्श करते हुए इन्द्रियों की स्थिरता एवं दृढ़ता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करे। 
ॐ वाङ् म आस्येऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अनामिका से मुख मे)
ॐ नसोर्मे प्राणऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठे से नासिका के दो छिद्र मे)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षरस्तु॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अंगुष्ठे से दोनों आँखों मे)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु॥ (दाहिने हाथ की  अनामिका और अंगुष्ठे से दोनों कानो मे)
ॐ बाह्वर्मे बलमस्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर दोनों भुजाओ मे)
ॐ उर्वोर्मे ओजोऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर जांघो मे)
ॐ अरिष्टानि मेङ्गानि तनुम्तन्वा मे सह सन्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर पूरा शरीर मे)
वाम हाथों का जल प्रक्षालन पात्र मैं डाल दैं। फिर दाहिना हाथ से आचमनी पात्र से चमास के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो लैं।
अग्नि-ज्वालन-मन्त्र 
ॐ भूर्भुवः स्वः 
इस मन्त्र का उच्चारण करके कपूर को अग्निपात्र मे रखकर उसमे छोटी छोटी लकड़ी लगाके यजमान उस पात्र को हाथों से उठाकर यदि गर्म होतो अग्निपात्र को चिमटे से पकड़कर खड़े हो कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे।
 भूर्भुवः॒ स्व᳕र्द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा । तस्या॑स्ते पृथिवी देवयजनि पृ॒ष्ठे᳕ऽग्निम॑न्ना॒दम॒न्नाद्या॒या द॑धे ॥ (यजु अ ३। म. ५)
इस मन्त्र से यज्ञकुण्ड के मध्य में अग्नि पात्र को रख कर , उसमे छोटी छोटी लकड़ी और कपूर अदि से अगला मन्त्र पढ़कर अग्नि को काष्ठ में प्रविष्ठ कराए।
ॐ ॐ उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि॒ त्वमि॑ष्टापू॒र्ते सᳬंसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ अध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत ॥(यजु अ १५ । म. ५४ )
समिदाधान मन्त्र 
जव अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे , तब आठ अङ्गुल की तीन समिधाये घृत में डुबाकर उनमे से नीचे लिखे मन्त्र से एक एक समिधा अग्नि में चढ़ावे। वे मन्त्र इस प्रकार है -
ॐ स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस से  प्रथम  (यजु अ ३।म. १)
ॐसुस॒मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये जातवेदसे (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस  से दूसरा  (यजु अ ३। म. २ )
ॐ तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृतेन॑ वर्द्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यवीष्ठ्य॒ स्वाहा॑ इदमग्नयेऽङ्गिरसे (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस  से  तीसरा (यजु अ ३। म.३)
पर्युक्षण मन्त्र 
अग्निकुण्ड के चारो और निम्न लिखित मन्त्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा में प्रणिता से जल लेकर प्रोक्षणी से जल सिंचन करे।
ॐ अदितेनुमन्यस्व ॥ इस मन्त्र से पूर्व में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ अनुमतेनुमन्यस्व॥ इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥  इस मन्त्र से  उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐ देव॑ सावितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः  के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।

निम्न लिखित मन्त्र से आज्यस्थाली में से स्रुवा को भरकर दाहिने हाथ की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से स्रुवा को पकड़कर पाञ्च घृताहुति दे। (यह जहाँ भी स्रुवा से आहुति दिया जायेगा सभी स्थानों में दाहिने हाथ की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से स्रुवा को पकड़कर आहुति दे ) 
ॐ अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ॥ इदमग्नये जातवेदसे (- न मम ) (-इदं न मम )
आधाराहुति 
 प्रजापतये  स्वाहा॥ इदं प्रजापतये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ (मौन  आहुति ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य दक्षिण में आहुति दे।  
ॐ इन्द्राय स्वाहा॥ इदं इन्द्राय (- न मम ) (-इदं न मम ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य उत्तर में  आहुति दे।  
(इस मंत्र से दोनों आधार को अग्नि के मध्य में पश्चिम से पूर्व की और सीधा रेखा में देना चाहिए। मध्य में आज्य की  धारा ना टूटनी चाहिए ना आपस में मिलाना चाहिए।)
आज्यभागहुति 
ॐ अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के उत्तर भाग की अग्नि में या आग्नेय कोण में आहुति दे।
ॐ सोमाय  स्वाहा॥ इदं सोमाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥  इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के दक्षिण भाग की अग्नि में या ईशान कोण में आहुति दे।
प्रातः कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः कालीन आहुतिया देवे। (अव यज्ञमान और उसके पत्नी को छोडकर वाकी सव व्यक्ति अखण्डित चावलों में घृत मिला हुआ तन्दुल पत्रों को लेकर दाहिना हाथो की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से अखण्डित चावलों को यज्ञकुण्ड में आहुति दे। यह प्रातः कालीन आहुतिया से  लेकर उभय कालीन प्रार्थना मंत्र आहुतिया तक दिया जाता है )
ॐ सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योतिः॒ सूर्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ ज्योतिः॒ सूर्यः॒ सूर्यो॒ ज्योतिः॒ स्वाहा॑॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जूरु॒षेसेन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णः सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहा॑॑क॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
सायं कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से सायं कालीन आहुतिया देवे 
ॐ अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑रग्निः॒ स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अग्निर्वर्चो योतिर्वर्चो स्वाहा  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑रग्निः॒ स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(मौन  आहुति )
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जू रात्र्येन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णोऽअ॒ग्निर्वे॑तु॒ स्वाहा॑  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥

उभय कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः काल एवं सायं काल दोनों समय प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतियो के पश्चात आहुतिया देवे। यदि किसि कारण से एक ही समय यज्ञ करना हो तो प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतिया इकट्ठी देकर उभय कालीन आहुतिया देवे। वे इस प्रकार है। 
ॐ भूरग्नये प्राणाय स्वाहा  इदमग्नये प्राणाय(- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ भुवर्वायवेपानाय स्वाहा॥ इदं  वायवेपानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥इदमादित्याय व्यानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। २ )
ॐ आपो ज्योतिरसो मृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा  इदमद्भ्यो ज्योतिषे रसायामृताय ब्रह्मणे (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। १५ )
उभय कालीन प्रार्थना मंत्र आहुतिया
पुनः निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः काल एवं सायं काल दोनों समय प्रातः कालीन,  सायं कालीन एवं उभय कालीन आहुतियो के पश्चात उभय कालीन प्रार्थना मंत्रो से आहुतिया देवे। यदि किसि कारण से एक ही समय यज्ञ करना हो तो प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतिया इकट्ठी देकर उभय कालीन आहुतिया और उभय कालीन प्रार्थना मंत्रो आहुतिया की देवे। वे इस प्रकार है। 
ॐ यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते । तया॒ माम॒द्य मे॒धायाऽग्ने॑  मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३२ ।म. १४ )
ॐ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव ।यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व॒ स्वाहा॑   इदं (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३० ।म. ३ )
ॐ अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑रा॒येऽअ॒स्मान विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्य᳕स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ४० ।म. १६ )
प्रजापत्याहुति मन्त्र 
 प्रजापतये  स्वाहा॥ इदं प्रजापतये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ (मौन  आहुति ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य में आहुति दे।  

अनुपय्यक्ष्य मन्त्र 
अग्निकुण्ड के चारो और निम्न लिखित मन्त्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा में प्रणिता से जल लेकर प्रोक्षणी से जल सिंचन करे।
ॐ अदितेनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से पूर्व में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ अनुमतेनुमंस्थाः॥इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से  उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐदेव॑ सावितः॒ प्रासा॑वी य॒ज्ञं प्रासा॑वी य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः  के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।
उस के वाद प्रदक्षिण द्वारा यज्ञकुण्ड के अग्नि को परिक्रमा ३ वार करे।
इस प्रकार अग्निहोत्र विधि या देवयज्ञ विधि समाप्त होता है।

Saturday, 1 July 2017

गृह वास्तु का ९ सूत्र

हम सभी जानते है की वास्तु विद्या भारतीय शिल्प शास्त्र का एक अङ्ग है । वास्तु विद्या भी अनेक प्रकार के है यथा गृह वास्तु, प्रसाद वास्तु, मन्दिर वास्तु, दूर्ग वास्तु, नाट्य शाला वास्तु, यान वास्तु इत्यादि । उसमे गृह वास्तु वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । जव हम गृह वास्तु का अध्ययन करते है तो हमे इससे आठ मुख्य सूत्र ओर एक गौण सूत्र प्राप्त होते है । यथा

  १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव । 
 २.  निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति ।
  ३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव ।
  ४.   गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण ।
 ५.  जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना ।
 ६.    भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव ।
  ७.   देश-काल-पात्र का परिगणन ।
  ८.    भूगोल के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

यह आठ मुख्य सूत्र है । और एक गौण सूत्र भी है ।

9.       ९. गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

प्रश्न उठता है कि जो गौण सूत्र है वह मुख्य सूत्र संख्या 8 का ही एक भाग है ! क्योकि खौगलिय ग्रहौं जो भूगल के उपर जव प्रभाव डालता है तो क्या वह गृह मे निवास करने वाले प्रतेक परिवार के सदर्स्य के उपर प्रभाव नहि डालते होगे ? अगर कहे कि प्रभाव डालता है तो अलग से सूत्र लिखने कि क्या जरुरत ? अगर यह कहे कि प्रभाव नहि डालता है तो गौण सूत्र लिखने कि क्या आवश्यकता ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है । भाव को स्पष्ट करने के लिये कभि कभि एक सूत्र को दो भाग मे वाटा जाता है । उसमे जो मुख्य प्रसङ्ग के साथ हो तो वह मुख्य सूत्र कहलाता है । ओर जो मुख्य प्रसङ्ग से अलग है वह गौण सूत्र कहलाता है । इसलिये अर्थ को स्पष्ट करने के लिये सूत्र संख्या 8 को दो भाग मे वाट कर दिया गेया है।

1) भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव अर्थात गृह और उसके भूगलिक स्थिति के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।
2) गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

किन्तु पहला भाग मुख्य विषय के साथ सम्पक है इसलिये वह मुख्य सूत्र हूआ । और दूसरा भाग इस विषय से अलग है इसलिये वह गौण सूत्र हूआ ।

एक दूसरा प्रश्न उठता है कि सभी वास्तु मे उपयोग होता है ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि सभी वास्तु मे उपयोग नहिं होता है । प्रसङ्ग के अनुसार कुच्छ सूत्र कम या अधिक होता हैं । यह विषय प्रसङ्ग से अलग है इसलिये यहाँ हम उसको यहाँ विचार नहि करंगे । लेकिन फिर कभि हम इसका विचार करेङ्गे ।
अव चलते है का संक्षेप मे विचार करते है ।

 १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव :- आज हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है हमे थोडा वहुत परिवेश का मन्युष्य के उपर क्या प्रभाव होता है यह हम सव जानते हैं । किन्तु परिवेश का गृह पर भी प्रभाव पडता है यह वहुत कम लोक ही जानते है । जैसे आच्छा परिवेश मे एक बालक का आच्छा स्वभाव और चरित्र बनता है । और खराव परिवेश मे एक बालक का स्वभाव और चरित्र खराव बनता है । उसि तरहा शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है । और कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । इसलिये हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है ।

पश्न उठता है कि जव हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है, तो क्या प्राचिन वास्तुकार के मतों को मानना जरूरी है ? अगर मानना जरूरी है तो आज के युग के अनुसार इस का वैज्ञानिक व्याख्या होना चाहिए ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि पहले जो वास्तुकार होते थे वह उस समय का देश-काल-पात्र को लेकर पुस्तक लिखा करते थे । लेकिन आज के युग मे उस का १00% लागु करना कष्ट है । क्यूकि उस समय का देश-काल-पात्र अलग था और आज का देश-काल-पात्र अलग है । लेकिन जो नियम है वह स्वास्वत है । वह कभि देश-काल-पात्र के साथ परिवर्तन नहि होता । हमारा काम है की उस नियम को देश-काल-पात्र के अनुसार व्यवहार मे लाना ।

तो हम हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है उस का वैज्ञानिक कारण है कि कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । और शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है ।

इस नियम को अगर आज के युग मे प्रयोग करेंग तो उस का व्याख्या इस प्रकार होगा किसि भि कोलाहल और अशान्त परिवेश जेसे मन्दिर के पाश, वस स्टाण्ड, रेल्व स्टेसन, विमान वन्दर, सिनिमा हल, कारखाना, आदि, राज रास्ता से अर्थात राष्ट का मुख्य रास्ता, राज्य का मुख्य रास्ता, रेल रास्ता आदि, कोलाहल परिवेश अर्थात वाजर, पाठशाल आदि, अशान्त परिवेश अर्थात शम्शान, चिकिच्छालय, आदि के पाश गृह वनाना मना है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

 निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति :- निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति का अर्थ है जहाँ हम गृह का निर्माण करते है उस निवास स्थान पर हम ज्यादा समय तक सुख सुविधा मै रहे पाएंगे । जैसे केसा है भूमि उर्वरता, रंग, गन्धादि का परिक्षण, भूमि ठोस हे कि नहि उस का परिक्षण, उस स्थान मे जल कि मात्र केसा है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्ष भर तापमान केसा रहता है उस का परिक्षण अर्थात थण्डा है या गरम, वहाँ किस प्रकार के जीव, वृक्ष और द्रव्य मिलता है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्षभर वायु का गति का परिक्षण इत्यादि ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे। 

३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव :- पृथिवि, जल, वायु, अग्नि और आकाश इसको पञ्च महाभूत कहते है । इन पञ्च महाभूतों का गृह मे क्या प्रभाव होता है उस का परिक्षण । क्योकि इस का परिवार के आरोग्य के साथ सिधा सम्पर्क है । गृह मे यदि पञ्च महाभूतों का उच्चित सम्नवय रहेगा तो गृह मे निवास करने वालो का स्वस्थ ठिक रहेगा । इसलिए गृह मे उचित मात्रा मे वायु और सूर्य किरण आना चाहिए । 

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

४.  गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण :- मानव हमेशा सुन्दरता का पूजा करते आया है और हमेशा करता रहेगा । मानव क्य़ा पशु-पक्षि-कीट-पतंग सभि सुन्दरता का पूजा करते है । तो मानव क्य़ो नहिं करेगा । क्यो कि हर सुन्दर वस्तु सभि को आनन्द देता है । और सभि चाहते है सुन्दर दिखन के लिए, सुन्दर द्रव्य पाने के लिए, सुन्दर गृह मे रहने के लेए । गृहादि को केसे सुन्दर वनाया जाये यह भि वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । इसलिए गृह का आभन्तर और वाह्य दोनो सुन्दर होना चाहिए । जिसको देखकर मन प्रफल्ल हो जाए ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।  

 ५. जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना :- क्या आपने कभि मधुमक्षि के छाता को देखा है । मधुमक्षि जव अपनि छाता तयार करता है तव अपनि रहने के लिए, अपनि अण्डे के लिए, अपनि खाद्य के लिए, रानि मधुमक्षि के लिए इत्यादि अलग अलग शाला वनते है । तो मानव अपने आवश्यकता के अनुसार गृह मे शाला का परिकल्पना यथा स्नानागार, पाकशाला, शयनशाला, भजनशाला इत्यादि अलग अलग शालाएँ नहीं कर सकता। य़ह प्रत्यक परिवार के लिए और परिवार के सद्रस्य के रुचि के अनुसार अलग अलग शाला वनाया जाता है और कुच्छ कुच्छ शालाएँ सभि के लिए एक जेसा होता है।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

६.   भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव :- हम सभि जानते है प्रत्यक पदार्थ मे कुच्छ शक्ति रहता है । उस तरहा हमारे पृथिवि और आकाशादि मे कुच्छ शक्तियां है । उस मे पृथिवि के शक्ति का परक्षण हम भूमि के उवरता के द्वारा जान सकते है । ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं को हम आयादि साधन ओर सही दिशा के द्वारा गृह को ऊजावान कर सकते है । उससे हम गृह मे पृथिवि के शक्ति ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं एकत्रित करके अपने जीवन को सफल कर सकते है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे । 

७.   देश-काल-पात्र का परिगणन :- जैसे सभि रोग के लिए एक औषधि नहि होता है । अलग अलग रोग के लिए अलग अलग औषधि होता है । उस तरहा वास्तु के नियम देश-काल-पात्र के अनुसार कुच्छ वदल जाता है । जैसे गृह शीतप्रधान देश मे अलग होता है और ग्रीष्मप्रधान देश मे अलग होता है यह देश के अनुसार उदाहरण हुआ। 200 साल पहले गृह निर्माण द्रव्य अलग होता था । और आज गृह निर्माण द्रव्य अलग है, यह काल के अनुसार उदाहरण हुआ । एक समान्य व्यक्ति के लिए गृह जैसे वनाया जाता है, एक धनि व्यक्ति के लिए उससे कहि सुन्दर वनाया जाता है यह पात्र के अनुसार उदाहरण हुआ ।

यह देश-काल-पात्र का संक्षेप परिगणन हुआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे ।

८.   भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- भूमि पर जो कुच्छ शक्ति ऊत्पन होता है उसका प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क आकशिय ग्रहौं, नक्षत्रों आदि से है । इसको आधुनिक विज्ञान भी मानता है । समुन्द्र के लहरे पर्णिमा के दिन वडा होता है और अमावास्या के दिन छोटा होता है यह एक छोटा उदाहरण है भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं के प्रभाव का। पृथिवि के कहाँ कहाँ पर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है । सूर्य और अन्य ग्रहका विभिन्न राशिपर क्या प्रभाव पडता है ? सूर्य के गतिका वास्तु परुष के गति साथ क्या सम्पर्क है ? वास्तुपुरुष के सिर ऐशन्य कौण मे क्यों है ? ईत्यादि सव भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव के भितर आता है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे । मनुष्यादि 

९.  गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- जव भूमि पर ग्रहौं, नक्षत्रों आदि के प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है, तो भूमि पर निवास करने वाले जीव, मनुष्यादि पर भि प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है । एक छोटा उदाहरण कहता हूँ पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगियों का पागलपन वढ जाता है । इस से पता चलता है कि ग्रहौं, नक्षत्रों का मनुष्य के उपर सम्पर्क होता है । मनुष्य के उपर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे ।

प्रश्न उठता है कि एक हि गृह का वास्तु एक होते हुए गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य अलग अलग क्यो है ?

इस का उत्तर यह है कि मनुष्य का जीवन को अगर वैल गाडि मान लिया जाए । तो इस वैल गाडि का दो पहया है भाग्य और वास्तु । कर्म इस वैल गाडि का वाकि अन्श है । मन और बुद्धि इस गाडि का खिचने के लिए दो वैल है । और मनुष्य का आत्मा इस वैल गाडि का चालक । अगर सव कच्छु ठिक है तो गाडि आरम से चलता है । किन्तु दो पहयामें से एक पहया खराप हो जाए । या दो वैलमें से एक ठिक से काम ना करे । या गाडि का वाकि अंश खराप हो जाए तो चालक गाडि को ठिक से चला नहि पाता । इस प्रकार भाग्य, वास्तु, कर्म, मन और बुद्धि सव कुच्छ ठिक हे तो मनुष्य का जीवन आरम से कटता है । अगर इसमे से एक ठिक नहि है तौ मनुष्य जीवन का ईह लोक और पर लोक दोनो खराब हो जाता है । 

मेरा अगला ब्लॉग होगा वास्तु से ब्रह्म ज्ञान


Shiva Temple: Material & Practical Lessons (Adhibhautik)

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