Monday, 15 May 2017

उपस्कारक ग्रंथ

इस ब्लॉग के हर एक पोस्ट मे मैने उपस्कारक ग्रंथ सूचि दे दिया है। मेरे वहुत सारे मित्र पूछ रहे है इस ब्लॉग के लिखने के लिए किस किस पुस्तक का सहायता लिया हूँ। मैने जिस जिस पुस्तक से अभी तक सहायता लिया हूँ, उसका सूची इसप्रकार है।  
  1. आयुर्वेदीय हितोपदेश : वैद्य रणजीत राय देसाई, श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्रा. लि., नागपुर, संस्करण २००५ ई।
  2. काश्यपीयकृषिपद्धति : कश्यप मुनि , व्यख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २०१३ ई। 
  3. गृहवास्तु प्रदीप : अज्ञात कृत, व्याख्याकार  डॉ. शैलजा पाण्डेय, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २०१० ई।
  4. गुहरत्नभूषण : श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, ज्योतिष प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २००९ ई। 
  5. ज्योतिष रत्नमाला: श्रीपति भट्टाचार्य,  डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २००४ ई।
  6. ज्यातिषवृतशतं : महेश्वरोपाध्याय कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८ ई।
  7. ज्यातिषसार : ज्योतिर्विद शुकदेव विरचित, टिककर पंडित केशव प्रसाद शर्मा द्विवेदी। संशोधक पंडित राधाकृष्ण मिश्र, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००५  ई।
  8. दीपिका वा शुद्ध दीपिका : महामहोपाध्याय श्रीनिवास प्रणीत कन्हेयालाल मिश्र टिका, खेमराज  श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००८ ई।
  9. देवालय चन्द्रिका : नारायण नम्बूदिरी, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं अनुभूति चौहान, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१५ ई।
  10. नारद संहिता :नारद मुनि, व्याख्याकार आचार्य रामजन्य मिश्र, चौखम्भा संस्कृत भवन, वाराणसी, संस्करण २०१५ ई।
  11. न्याय दर्शन :गौतम, अनुवादक ठाकुर उदय नारायण सिंह, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी,  संस्करण २०१५  ई।
  12. न्याय दर्शन :गौतम, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१७  ई।
  13. पञ्चतन्त्र: श्रीविष्णुशर्मा प्रणीत, व्याख्याकार श्री श्यामचरण पाण्डेय, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, संस्करण २००६ ई।
  14. प्रमाणमंजूरी : सूत्रधार मल्ल,सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू,चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००४  ई।
  15. ब्रह्मसूत्र : बादरायण, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  16. बृहद वास्तुमाला: श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी संस्करण २०१४ ई। 
  17. बृहत शिल्पशास्त्र : दयानिधि खड़ीरत्न, धर्मग्रन्थ स्टोर, कटक, संस्करण २००२ ई। 
  18. मयमत: मयमुनि, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २००४  ई।
  19. मण्डपकुण्डसिद्धि : श्रीमद्विट्ठल दीक्षित कृत, व्यख्याकार आचार्य श्रीनिवास शर्मा, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००२ ई।
  20. मनुस्मृति : मनु, भाष्यकार डॉ. सुरेन्द्रकुमार, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  21. मर्म विज्ञान: पं रामरक्ष पाठक, चौखम्भा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  22. मुहूर्त चिंतामणि : श्रीरामाचार्य, व्याख्याकार महीधर शर्मा, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई , संस्करण २००८ ई।
  23. मानसार : मानसार, टिकाकार शेवप्रसाद वर्मा, स्थापत्य वेद शिक्षण एबं शोध संस्थान, इंदौर, संस्करण २००९ ई। 
  24. मनुष्यालय चन्द्रिका : नारायण नम्बूदिरी, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २०१३ ई। अंग्रजी मे इंजीनियरिंग टिका , डॉ. ए अच्युतन तथा डॉ बालगोपाल टी एस प्रभु , वास्तुविद्या प्रतिस्थानम , कालीकट, संस्करण १९९८ ई।  
  25. मुहूर्त दीपक : श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  26. योगयात्रा : वराहमिहिर, ब्याख्याकार डॉ.  सत्येन्द मिश्र, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २०१० ई।
  27. योगदर्शन : पतंजलि, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१५  ई। 
  28.  राजमार्तण्ड : राज भोज, व्यख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू , चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८  ई।
  29. विसर्ग से सृस्टि की उत्पत्ति ( प्रत्यक्ष शारीर विज्ञान): डॉ. हीरालाल शर्मा और डॉ सुधा शर्मा, चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  30. विश्ववल्लभ - वृक्षायुर्वेद: चक्रपाणि मिश्र , सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००४ ई।
  31. वास्तुरत्नावली : श्रीजीवनाथ झा, टीकाकार श्रीमदच्युतानन्द झा , चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण  १९८१ ई। 
  32. वास्तुरत्नाकर : श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१२  ई। 
  33. वृक्षायुर्वेद: सुरपाल, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २००४  ई। 
  34. वृहत्संहिता : वराहमिहिर, सम्पादका एबं ब्याख्याकार डॉ.  सुरकान्त झा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१२ ई। 
  35. वस्तुराजबल्लभ : श्रीमंडन सूत्रधार  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई। 
  36. वास्तुकल्पलता : डॉ. हरिहर त्रिवेदी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७ ई।
  37. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र : विश्वकर्मा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१० ई। 
  38. विश्वकर्मा विद्याप्रकाश: रविदत्त शास्त्री, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २०१६  ई। 
  39. वास्तु एबं शिला चयन : डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू , न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००५ ई। 
  40. वास्तु सौख्य : श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला , संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी,  संस्करण २०१० ई। 
  41. वास्तु उद्धार धोरणी : सूत्रधार गोविंद, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००८ ई।
  42. वास्तुसारमण्डन एबं आयतत्त्व : श्रीमंडन सूत्रधार, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  43. वास्तुविद्या : अज्ञात कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००९  ई।
  44. वास्तुमंजरी : सूत्रधार नाथ कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१४  ई।
  45. विश्वकर्मा प्रकाश : विश्वकर्मा  खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २०१४  ई।
  46. वास्तु सारणी :श्री श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, मास्टर खेलाडी लाल संकटा प्रसाद, वारणशी, संस्करण २०१३  ई।
  47. वैशेषिक दर्शन : कणाद, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  48. शिल्पशास्त्र :बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  49. शिल्प दीपक : श्रीगंगाधर, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००५  ई।
  50. शिल्प शास्त्रे आयुर्वेद : भूलोकमल सोमेश्वर,सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८ ई।
  51. सकलाधिकार : अगस्त्य मुनि, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  52. सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र : डॉ  निमाई वानारजी, रामचंद्र दास, ज्ञानजूग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर।
  53. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ भोजराज द्विवेदी, डाइमंड वूक्स, न्यू दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  54. समरांगणसूत्रधार : महाराजा भोज, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण  २०११ ई।
  55. सांख्यदर्शन : कपिल, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१५ ई।
  56. Fabric of the Universe: the orignins, implications, andapplication of vastu science, by Jessie J. mercay, Dakshinaa publishing house, chennai, editions 2008. 
  57. Time = Space raguram Gopalan, http:/ragsgopalan.blogspot.com, editions 2012. 
  58. Aintiram : Maya Editor & Translator Dr. S. P. Sabharathnam,  Vaastu Vedic Research  Foundation, Chennai , editions 1997.  

Monday, 8 May 2017

गृहारम्भ तिथि,पक्ष और वार विचार

पक्ष के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

अब हम पक्ष के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।  

हम सभी जानते है चंद्र मास मे दो पक्ष होता है।
प्रथम शुक्ल पक्ष
और दूसरा कृष्ण पक्ष।

वास्तुगोपाल का लेखक के अनुसार और देवीपुराण का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष मे गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु कृष्ण पक्ष मे गृहरम्भ का फल चौरभय होता है। परन्तु राजमार्ताण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण इस प्रकार है शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा निर्वल होता है। इस कारण गृहरम्भ का फल अशुभ होता है। उसी प्रकार शुक्ल पक्ष पञ्चमी से सप्तमी पर्यन्त चन्द्रमा हीनवली होता है। और शुक्ल पक्ष अष्टमी से दशमी पर्यन्त चन्द्रमा मध्यवली होता है। और शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु नारद संहिता का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष  के एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त और कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण यह है की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ हो सकता है।

तिथि के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

हम सभी जानते है चंद्र मास मे ३० दिन होता है। उसमे कृष्ण पक्ष का १५ दिन और शुक्ल पक्ष का १५ दिन।

कृष्ण पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी १५. अमावस्या। 

शुक्ल पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी, १५. पूर्णिमा।

अब हम तिथि के अनुसार गृहारम्भ का फल विचार करेंगे।

१. प्रतिपदा : शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण करने से दुःख को प्राप्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से दरिद्रता को प्राप्त होता हैं। किन्तु वस्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

२. द्वितीया: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार द्वितीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। किन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वितीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

३. तृतीया : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न अनुसार तृतीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष तृतीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल तृतीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

४. चतुर्थी : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्थी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। परन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। 

५. पञ्चमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पञ्चमी तिथि में गृह निर्माण करने से चित्तचांचल्य होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष पञ्चमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल पञ्चमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

६. षष्ठीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार षष्ठी तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

७. सप्तमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार सप्तमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष सप्तमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल सप्तमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

८. अष्ठमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अष्ठमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से उद्वास होता है।  

९. नवमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार नवमी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धान्य का नाश होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं।

१०. दशमीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार दशमी तिथि में गृह निर्माण करने से चौरभय रहता हैं। किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष दशमी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल दशमी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

११. एकादशीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार एकादशी तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल एकादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं 

१२. द्वादशीवास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार द्वादशी तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१३. त्रयोदशी :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार त्रयोदशी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल त्रयोदशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१४. चतुर्दशी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्दशी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से स्त्रीविनाश होता है।  

१५. अमावस्या :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अमावस्या तिथि में गृह निर्माण करने से गृहस्वामी का नाश होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से स्थाननाश  होता हैं।वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब, से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।   

१६. पूर्णिमाशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पूर्णिमा तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।  परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है किन्तु पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं।

वार के अनुसार गृहारम्भ फल विचार
अब हम वार के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।

हम सभी जानते है ज्योतिष शास्त्र मे वार सात है।
१. रविवार
२. सोमवार
३. मंगलवार
४. बुधवार
५. गुरुवार
६. शुक्रवार
और ७. शनिवार  

१. रविवार: शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार रविवार के दिन गृह निर्माण करने से अग्नि का भय रहता है। इस मत का समर्थन राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक करता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है।

२. सोमवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार सोमवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक करता है। किन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से अर्थलाभ होता है। परन्तु बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ किन्तु  गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है।

३. मंगलवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मंगलवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे वज्रपात होता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। परन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से क्षति होता है। और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना मृत्यु का भय लगा रहता है।

४. बुधवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार बुधवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

५. गुरुवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार गुरुवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

६. शुक्रवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शुक्रवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

७. शनिवार:  शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शनिवार के दिन गृह निर्माण करने से धन का क्षय और शोक होता है। किन्तु दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार को गृह निर्माण करने से अशुभ होता है। परन्तु मुहूर्तदीपक का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है। बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करनें से गृह स्वामी शोकातुर रहता है। और राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से भय रहता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. दीपिका वा शुद्ध दीपिका : महामहोपाध्याय श्रीनिवास प्रणीत कन्हेयालाल मिश्र टिका, खेमराज  श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००८ ई।
  2. मुहूर्त दीपक : श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  3. वास्तुरत्नावली : श्रीजीवनाथ झा, टीकाकार श्रीमदच्युतानन्द झा , चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण  १९८१ ई। 
  4. बृहत शिल्पशास्त्र : दयानिधि खड़ीरत्न, धर्मग्रन्थ स्टोर, कटक, संस्करण २००२ ई।
  5. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ. निमाई बेनर्जी और रमेशचंद्र दाश, ज्ञानयुग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर, संस्करण २०१४ ई।
  6. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  7. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी संस्करण २००६ ई।
  8. वस्तुराजबल्लभ : श्रीमंडन सूत्रधार,  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई। 
  9. वास्तुरत्नाकर : श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २०१२ ई।
  10. वास्तु सौख्य : श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला, संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी, संस्करण २०१० ई। 
  11. वास्तुकल्पलता : डॉ. हरिहर त्रिवेदी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७  ई।

Tuesday, 18 April 2017

गृहारम्भ नक्षत्र विचार

भारतीय ज्योतिष मे नक्षत्र २७ प्रकार के होते है 

१. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी,५. मृगशिरा, ६. आद्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्या, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वा फाल्गुनीम, १२. उत्तरा फाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढा, २१. उत्तराषाढ़ा, २२. श्रवणा, २३. धनिष्ठा, २४. शतभिषा, २५. पूर्वा भाद्रपद, २६. उत्तरा भाद्रपद, २७. रेवती।

अब हम प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार गृहारम्भ का फल विचार करेंगे।

१. अश्विनी: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र और वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार अश्विनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रवास होता हैं।

२. भरणी: वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार भरणी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रवास होता हैं। 

३. कृत्तिका : वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार कृत्तिका नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं। 

४. रोहिणी: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार रोहिणी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं।  ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

५. मृगशिरा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल उद्वेग होता हैं।

६. आद्रा: ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार आद्रा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

७. पुनर्वसु :  ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

८. पुष्या: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, ज्योतिस्सागर के के लेखक के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार पुष्या नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल पुत्रप्राप्ति होता हैं। 

९. आश्लेषा: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार आश्लेषा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

१०. मघा: शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार और ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार मघा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं।  किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

११. पूर्वा फाल्गुनी: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल धनाप्ति होता हैं। 

१२. उत्तरा फाल्गुनी:  वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं।

१३. हस्त: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार हस्त नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं। 

१४. चित्रा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार, और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार चित्रा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शोक होता हैं।

१५. स्वाती: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार स्वाती नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।

१६. विशाखा: वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार विशाखा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।

१७. अनुराधा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार अनुराधा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शत्रुभय होता हैं।ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं।  

१८. ज्येष्ठा: वास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार और शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं।

१९. मूल: वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार मूल नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं। 

२०. पूर्वाषाढा: वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार पूर्वाषाढा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल राजभय होता हैं। 

२१. उत्तराषाढ़ावास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तराषाढ़ा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२२. श्रवणा: शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार और राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार श्रवणा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल एबं पराशर मतो मे शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। 

२३. धनिष्ठाराजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार धनिष्ठा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल मृत्यु होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२४. शतभिषा: राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार शतभिषा नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

२५. पूर्वा भाद्रपद: ज्योतिस्सागर के लेखक के अनुसार पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किंतु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं।

२६. उत्तरा भाद्रपदवास्तुराजवल्लभ के लेखक श्री मण्डन मिश्र के अनुसार, राजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार, मुहूर्तदीपक के लेखक श्रीमहादेव भट्ट के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल सुख होता हैं। ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं।

२७. रेवतीराजमार्त्तण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार, शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार, मुहूर्तगणपति के लेखक के अनुसार, मुहूर्तचिंतामणि के लेखक श्रीरामाचार्य के अनुसार और वास्तुकल्पलता मे गर्ग मत का संग्रह किया है, उसके के अनुसार रेवती नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल शुभ होता हैं। किन्तु वास्तु सौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल ने पराशर मत का संग्रह किया है, उसके  के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल लक्ष्मी प्राप्ति होता हैं। परन्तु वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार और ज्यातिर्निवंध के लेखक के अनुसार इस नक्षत्र मे गृहारम्भ का फल प्रशस्त्र होता हैं। 

उपस्कारक ग्रंथ वास्तु
  • बृहद वास्तुमाला : श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
  • वास्तुरत्नाकर :श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २०१२  ई।
  • शिल्पशास्त्र :बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २००६  ई।
  • मुहूर्त दीपक :श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी  २००६  ई। 
  • मुहूर्त चिंतामणि :श्रीरामाचार्य, व्याख्याकार महीधर शर्मा,खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई , २००८  ई।
  • ज्योतिष रत्नमाला:श्रीपति भट्टाचार्य,  डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली २००४  ई।
  • वास्तु सारणी :श्री श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, मास्टर खेलाडी लाल संकटा प्रसाद, वारणशी, २०१३  ई। 
  • वस्तुराजबल्लभ :श्रीमंडन सूत्रधार  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई।
  • वास्तुकल्पलता :डॉ. हरिहर त्रिवेदी ,चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७ ई।
  • वास्तु सौख्य :श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला , संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी,  संस्करण २०१० ई। 
  • सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र :डॉ  निमाई वानारजी , रामचंद्र दास, ज्ञानजूग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर।

Wednesday, 29 March 2017

मास के अनुसार गृहारंभ फल

मास ४ प्रकारके होते  हैं

१. चंद्र मास
२. सौर  मास
३. सावन मास
४. नक्षत्र मास

आज हम पंचांग के ऊपर चर्चा न करके चंद्र मास, सौरमास और चंद्रसौर मास  के अनुसार के अनुसार गृहारंभ का फल चर्चा  करेंगे।

चंद्रमास के अनुसार गृहारंभ फल :-

१. चैत्र : विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक के अनुसार चैत्र मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को व्याधि होता है । इस मत का समर्थन वास्तु गोपाल का लेखक और वास्तु प्रदीपका लेखक करते हैं। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति जी ने इस मास मे गृह निर्माण करने का फल गृहपति को शोक होता हैं। इस मत का समर्थन शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, शिल्पदीपक के लेखक, और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र करते हैं।

२. वैशाखशिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार वैशाख मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन -रत्न की प्राप्ति होता है। इस मत का समर्थन ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपतिशिल्प दीपक के लेखक, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करते हैं। किंतु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत का संग्रह किया है उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य प्राप्ति होता है ।

३. ज्येष्ठ: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार ज्येष्ठ मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मृत्यु होता है। इस मत का समर्थन ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करते है। किंतु शिल्प दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृह मे रहने वालो को पीड़ा होता है।

४. आषाढ़: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार आषाढ मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन लाभ और पशुधन की वृद्धि होता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का पशुधन मे हानि होता है। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को भृत्य और रत्नो की प्राप्ति होता है, किन्तु गृहपति का पशुधन की हानि होता हैं।

५. श्रावण: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार श्रावण मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को भूमि  का लाभ होता है। शिल्प  दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन की वृद्धि होता है। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को द्रव्य की वृद्धि होता है। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक और वास्तु  प्रदीप के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को मित्र का लाभ होता है। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार श्रावण मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पशुधन की वृद्धि होता है। किन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य की प्राप्ति होता है। वास्तु गोपाल के लेखक ने इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मृत्यु  होता है।

६. भाद्रपद: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार भाद्रपद मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का हानि होता है। और इसका समर्थन  वास्तु गोपाल के लेखक करता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार गृह निर्माण फल शुन्य होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति के मत मे इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का विनाश होता हैं। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक और वास्तु  प्रदीप के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का मित्र की हानि होता हैं।

७. आश्विन: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे आश्विन मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति पत्नीका  का नाश होता है। इस का समर्थन वास्तु गोपाल के लेखक और वास्तु प्रदीप के लेखक करता है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति के गृह मे कलह होता है। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र ओर विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति के गृह मे युद्ध होता है। परन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने वशिष्ठ मत का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का पुत्र -पौत्र -धन की वृद्धि होता हैं।

८. कार्त्तिक: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे कार्त्तिक मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को बहुपत्नी प्राप्ति होता हैं। किन्तु शिल्प  दीपक के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का नाश होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति की भृत्य का क्षय होता है। विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु गोपाल के लेखक  और वास्तु प्रदीप के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन - धान्य की लाभ होता है। परन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य प्राप्ति होता हैं।

९. मार्गशीष: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे मार्गशीष मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन की प्राप्ति होता हैं। इसका समर्थन शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, वास्तु प्रदीप के लेखक, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक और वास्तु गोपाल के लेखक करता है। किन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति का धन की वृद्धि होता है। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास  गृह निर्माण करने से गृहपति को धान्य की लाभ होता है। किंतु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य होता हैं।

१०. पौष: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे पौष मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को चौर और तस्करों का भय होता है। इसका समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तु प्रदीप के लेखक और  वास्तु गोपाल के लेखक करते है। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को गृह मे धन - सम्पदा का आगमन होता हैं। परन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धान्य का लाभ होता हैं।

११. माघ: शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे माघ मास मे गृह निर्माण करने से अशुभ, गृहपति को भय और अग्नि का भय होता हैं। किन्तु शिल्प दीपक के लेखक, ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक, विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक, वास्तुराजवल्लभ  के  लेखक मण्डन मिश्र और वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को अग्नि का भय होता है। परन्तु वास्तु प्रदीप के  लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को बहुत लाभ किन्तु अग्नि भय होता हैं। ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आराग्य प्राप्ति होता हैं।

१२. फाल्गुन:  शिल्प शास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मे फाल्गुन मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को स्वर्ण की प्राप्ति होता है। शिल्प दीपक के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करना श्रेष्ठ होता हैं। किन्तु ज्योतिष रत्नमाला के लेखक श्रीपति और वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को धन प्राप्ति होता हैं। ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को श्री प्राप्ति होता हैं। परन्तु विश्वकर्मा प्रकाश के लेखक के अनुसार इस  मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को लक्ष्मि और वंश मे वृद्धि होता हैं। वास्तु प्रदीप के लेखक अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को रत्न की प्राप्ति होता हैं। वास्तु गोपाल के लेखक के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र का लाभ होता हैं। किन्तु ज्योतिष निर्बंध शास्त्रे के लेखक ने नारद मत और वशिष्ठ मतो का संग्रह किया है, उस के अनुसार इस मास मे गृह निर्माण करने से गृहपति को पुत्र और आरोग्य होता हैं।

सौरमास के अनुसार गृहारंभ फल:- 
अव हम सौर के अनुसार गृहारंभ का फल सौरमास २ प्रकार के होता है।

१. सायन
२. निरायन।

यहाँ पर निरायन सौरमास का गृहारंभ फल विचार किया गया है।

१. मेष : ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मेष मास में गृह निर्माण का फल शुभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को मेष मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए। 

२. वृष: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने वृष मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का धन वृद्धि होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में दक्षिण या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को वृष मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

३. मिथुन: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मिथुन मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का मृत्यु होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

४. कर्क: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कर्क मास में गृह निर्माण का फल शुभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कर्क मास मे  पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

५. सिंह: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने सिंह मास में गृह निर्माण का फल गृहपति का सेवकों की वृद्धि होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कर्क मास मे  पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

६. कन्या: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कन्या मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रोग होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

७. तुला: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने तुला मास में गृह निर्माण का फल  गृहपति का सौख्य होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है।किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में  दक्षिण या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को तुला मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

८. वृश्चक: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार  ने वृश्चक मास में गृह निर्माण का फल धनवृद्धि होता हैं। विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक कहता है  इस मास में गृह निर्माण का फल धन धान्य वृद्धि है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को वृश्चक मास मे  दक्षिण  या उत्तर दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

९. धनु: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने धनु मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को महा हानि  होता हैं। विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक कहता है इस मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को हानि है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है। 

१०. मकर: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मकर मास में गृह निर्माण का फल धन का आगमन होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है।किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को मकर मास मे पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

११. कुंभ: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने कुंभ मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रत्न का लाभ होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण ही शुभ है। अर्थात गृहपति को कुंभ मास मे पूर्व और पश्चिम दिशा का गृह निर्माण करना चाहिए।

१२. मीन: ज्योतिष निर्बंध शास्त्र के लेखक ने अपनी पुस्तक मे कहा है की नारद मत के अनुसार ने मीन मास में गृह निर्माण का फल गृहपति को रोग होता हैं। इस मत का समर्थन विश्वकर्मा प्रकाश का लेखक करता है। किन्तु वास्तुराजवल्लभ का लेखक मण्डन मिश्र ने कहा है इस मास में गृह निर्माण करना अशुभ होता है।

सौरचंद्रमास के अनुसार गृहारंभ फल:-

प्रश्न उठता है की सौर मास गृहारंभ फल और चंद्र मास गृहारंभ फल का विचार हम पहले कर चुके है। तो फिर सौरचंद्र मास गृहारंभ फल का विचार अलग से विचार करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर भारतीय पचांग मे है। हम सब जानते है, सौरवर्ष का गणना लगभग स्थिर है। किन्तु चंद्रवर्ष का गणना अस्थिर है। उसको सौरवर्षके साथ समानता करने के लिये कभी १ मास जोड़ना होता है तो कभी १ मास घटना होता है। दूसरा एक और कारण भी है हमारे यहाँ चन्द्रमास का गणना २ तरहा से होता है। 

१. शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गणना होता है।
२. कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से गणना होता है।

आचार्य रामदैवज्ञ अपनी पुस्तक मुहूर्त चिन्तामणि मे कहा है की यदि फाल्गुन मास मे रवि कुम्भ राशि मे है तो पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। यदि  श्रावण फाल्गुन मास मे रवि सिंह राशि मे है तो भी पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा पौष मासमे रवि मकर राशि मे है तो भी पूर्व और पश्चिम मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

आचार्य रामदैवज्ञ का कहना है यदि वैशाख मास मे रवि मेष राशि मे हो या वृष राशि मे हो तो दक्षिण और उत्तर मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा मार्गशीष मास मे रवि तुला राशि मे हो या वृश्चिक राशि मे हो तो दक्षिण और उत्तर मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

वास्तुरत्नावली मे श्रीपति के मत के नाम पर जो कुछ दिया गया है वह श्रीपति के मुहूर्तरत्नावली मे नहीं है। यह श्रीपति के और किसी साहित्य मे हो यह अभी कह नहीं सकता।

वास्तुरत्नावली मे यह भी कहा गेया है की किसी किसी आचार्य का मत मे चैत्र मास मे रवि मेष राशि मे स्थित है तो किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण शुभ होता है। उसी तरहा ज्येष्ठ मास मे वृष राशि स्थित रवि, आषाढ मास मे कर्क राशि स्थित रवि, भाद्रपद मास मे सिंह राशि स्थित रवि, आश्विन मास मे तुला राशि स्थित रवि, कार्त्तिक मास मे वृश्चिक राशि स्थित रवि, पौष मास मे मकर राशि स्थित रवि और माघ मास मे कुम्भ राशि स्थित रवि मे भी किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण शुभ होता है।

किन्तु कार्त्तिक मास मे कन्या राशि स्थित रवि मे गृह निर्माण करना शुभ नही होता। उसी तरहा माघ मास मे धनु राशि स्थित रवि, चैत्र मास मे मीन राशि स्थित रवि, ज्येष्ठ मास मे मिथुन राशि स्थित रवि, आषाढ मास मे भी मिथुन राशि स्थित रवि, भाद्रपद मास मे कन्या राशि स्थित रवि, पौष मास मे धनु राशि स्थित रवि और फाल्गुन मास मे कुम्भ राशि स्थित रवि रहने से किसी भी प्रकार के मुख का गृह निर्माण अशुभ होता है।

इसलिए जिस स्थान मे जो पंचांग का व्यवहार होता है, उसमे कोनसा चंद्रमास व्यवहार होता है, उसका सौरवर्ष के साथ मिलकर गृहारंभ फल का विचार करना चाहिए। 
                                                           
                                      उपस्कारक ग्रंथ सूची
१. ज्ञानप्रकाशदीपार्णव वास्तुशास्त्र : संपादक प्रभाशंकर ओघोड़ भाई सोमपुरा, पालीताणा, संस्करण १९६४ ई.।
२. मुहूर्तचिंतामणि : श्रीरामाचार्य कृत, पंडित महीधर शर्मा कृत भाषा टीका, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुम्बई, संस्करण २००४ ई.।
३. विश्वकर्मा प्रकाश: विश्वकर्माकृत, संपादक और अनुबाद मिहिरचंद खेमराज, श्रीकृष्णदास , मुम्बई, संस्करण २००४ ई.।
४.ज्योतिष निर्बंध: आनंद आश्रम संस्कृत ग्रंथ माला, पूना,(क्रम ८५ )संशोधक - रंगनाथ शास्त्री, और प्रकाशक विनायक गणेश आप्टे, संस्करण १९१९ ई.।
५. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ. निमाई बेनर्जी और रमेशचंद्र दाश, ज्ञानयुग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर, संस्करण २०१४ ई.।
६. ज्योतिषरत्नमाला : दैवज्ञ श्रीपतिभटाचार्य सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, परिमल प्रकाशन, दिल्ही, संस्करण २००४ ई.।
७. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, संस्करण २००६ ई.।
८. वास्तुराजवल्लभ : श्रीमण्डन मिश्र, सम्पादक एबं व्याख्याकार स्व. श्री अनूप मिश्र और रामयत्न शर्मा, मास्टर खेलाडीलाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई.।
९. वास्तुरत्नावली : श्री जीवनाथ शर्मा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार श्री अच्युतानंद झा, चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन ,वाराणसी,  संस्करण १९८१ ई.।

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