Sunday, 21 October 2018

वेदांग शिक्षा २

स्थानप्रकरणम्
तावत्  तत्र स्थानम्।१।
कण्ठ्याः अकवर्गहविसर्जनीयाः।२
एकेषां हविसर्जनियावुरस्याः ।३।
जिह्व्यो जिह्वामूलीयः।४।
ऋवर्ण कवर्गश्च जिह्व्यः एकेषाम् ।५।
एकेषां कवर्गावर्णानुस्वारजिह्वामूलीया जिह्वया।६।
एके सर्वमुखस्थानमवर्णमिति।७।
एके कण्ठ्यानास्यमात्रानिति।८। 
तालव्याः इचवर्गरशाः।९।
मूर्धन्याः ऋटवर्गरषाः।१०।
दुःस्पुष्टः अपि।११।
रेफो दन्तमूलीस्थानमेकेषाम्।१२।
दन्त्याः लृतवर्गलसाः।१३।
एकेषां दन्तमूलस्तु तवर्गः।१४।
दन्त्योष्ठ्यो वकारः।१५।
एकेषाम् सृक्किणीस्थानम्।१६।
ओष्ठ्याः उपूपध्मानीया।१७।
नासिक्याः अनुस्वारयमाः।१८।
नासिक्यः अपि।१९।
एकेषां कण्ठ्यनासिक्यमनुस्वारम्।२०।
एकेषां यमाश्च नासिक्य जिह्वामूलीयः।२१।
कण्ठतालव्यौ ए ऐ।२२।
कण्ठोष्ठ्यौ ओ औ।२३।
स्वस्थाननासिकास्थानाः ङञणनमाः।२४।
सन्ध्यक्षराणि द्विवर्णानि।२५।
सरेफ ऋवर्णः। २६।
सलकार लृवर्णः।२७।
एवमेतानि स्थानानि।२७।


करण प्रकारणम्
करणं अपि। १।
जिह्व्यतालव्यमूर्धन्यदन्त्यानां करणं जिह्वा। २।
जिह्व्यानां जिह्वामूलेन। ३।
तालव्यानां जिह्वामध्येन। ४।
मूर्धन्यानां जिह्वोपाग्रेण। ५।
करणं वा जिह्वाग्राधः। ६।
दन्तानां जिह्वाग्रेण। ७।
स्वस्थानकरणाः शेष वर्णाः। ८।
एतत् करणमिति।८।








वेदांग शिक्षा 1


अथ वर्णाः।१।
स्थानकरणप्रयत्नपरेभ्यो त्रिषष्टिः वर्णाः।२।
चतुःषष्टिः एकेषाम्। ३।
क्रम प्रकरणम्
अथातो वर्ण क्रमः।१।
तत्र स्वराः प्रथमम्।२।
अ आ आ३।३।
इ ई ई३।४।
उ ऊ ऊ३।५।
ऋ ॠ ॠ३ ।६।
ऌ ॡ३।७।
अथ सन्ध्यक्षराणि।७।
ए ए३।८।
ऐ ऐ३।९।
ओ ओ३।१०।
औ औ३।११।
इति सन्ध्यक्षराणि।१२।
इति स्वराः।१३।
अथ व्यञ्जनानि।१४।
तत्र स्पर्शाः प्रथमम्।१५।
क ख ग घ ङ कवर्गः।१६।
च छ ज झ ञ चवर्गः।१७।
ट ठ ड ढ ण टवर्गः।१८।
त थ द ध न तवर्गः।१९।
प फ ब भ म पवर्गः।२०।
इति स्पर्शाः।२१।
अथान्तःस्थाः।२२।
य र ल व।२३।
इति अन्तःस्थाः।२४।
अथोष्माणः।२५।
श ष स ह।२६।
अथोयोगवाहाः।२७।
ᳲक जह्वामुलियः।२८।
ᳲप उपध्मानीयः।२९।
इति उष्माणः। ३०। 
अः विसर्जनीयः।३१।
अं अनुस्वारः।३२।
कुँ खु़ँ खु़ँ घुँ यमाः।३३।
एते वर्णास्त्रिषष्टिः।३४।
हुँ नासिक्य एकेषाम्।३५। 
इति अयोगवाहाः। ३६।
ळ दुःस्पृष्टः एके।३७।
चतुःषष्टिरित्येके।३८। 
इति व्यञ्जनानि। ३९।
एष क्रम वर्णानामिति।४०।

Monday, 26 March 2018

अग्निहोत्र विधि

अग्निहोत्र विधि 
अव हम नित्यकर्म का तृतीय प्रश्न का उत्तर देते है।

पञ्चभू संस्कार 
पञ्चभू संस्कार जिसे प्राचीन गृह सूत्र मे लक्षणवृत भी कहते है उसको सभी संस्कारादि मै अग्नि स्थापना करना से पूर्व करना चाहिये। यह इसप्रकार है :
१. यज्ञकुण्ड में स्थित धूलि को साफ करना। 
२. कुण्ड को गोबर और जल से लीपना। 
३. व्रज (जो  काष्ठ का खंड होता है ) या उसके आभाव मे स्रुवमुल से यज्ञकुण्ड के बरावर तीन रेखाये पूर्व से उत्तर तक खींचना चाहिये। 
४.  व्रजसे खींची गई रेखाओं से मिट्टी को अङ्गुष्ठा और अनामिका से  अलग करे। 
५. जल से यज्ञकुण्ड को छिडके। 
अग्निहोत्र पात्र 
१. स्रुव -२
२. आज्यस्थाली -२ 
३. प्रोक्षणी -१ 
४. प्रणिता -१ 
५. पञ्च पात्र और आचमनी-२ (यह गृह के जितना लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक )
६. अग्निपात्र -१ 
७. चिमिटा -१ 
८. वज्र -१ 
९. आसान -२ (यह गृह के जितना लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक )
१०. कुशा 
११. जल 
१२. आज्य 
१३. अखण्डित चावल 
१४. समिधा की एक टोकरी 
१५. चुल्ला 
१६. चावल रखने केलिए वड़ा पात्र (वड़ा तन्दुल पात्र )
१७. छोटेतन्दुल पात्र (यजमान और यजमान की पत्नी को छोड़ अन्य लोक होंगे उतने लोक केलिये एक एक)
१८. स्रुच -१ 
१९. प्रक्षालन पात्र १
कुछ सामान्य नियम 
१. अखण्डित चावल को वड़ा तन्दुल पात्र में पानी लेकर तीन वार जल मे धोना चाहिए। 
२. फिर उसमे कुछ घी उसमे मिलाना चाहिए। 
३. फिर उसको छोटेतन्दुल पात्रमे थोडा थोडा रखना चाहिए।
४. स्रुव और प्रोक्षणी को साफ करके अपनी दाहिने भाग मे रखे। 
५. आज्य को आज्यस्थाली मे लेकर चुल्ला मे गरम कर लेना चाहिए। अगर आज्य मे कुछ गिरा होतो कुशा से निकल देना चाहिए। 
६. उसी तरह प्रणिता मे जल लेकर यज्ञकुण्ड के पास रखना चाहिए। 
७. पञ्चपात्रमे थोडा थोडा जल रखना चाहिए। 
८. यजमान और यजमान की पत्नी दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम दिशा मे बैठे। वाकी सब यज्ञकुण्ड के चारो और बैठे जाये। 
दीपक प्रज्वलन मन्त्र 
ॐ अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृत्विज॑म् । होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ॥ १. १. १. 
इस मन्त्र से सवसे पहले अग्निको दियासिलाई से दीपक को प्रज्वलित करे। और उसको यज्ञकुण्ड के आग्नेय कोण के पास रख ले। 
आचमन मन्त्र 
सबसे पहले निम्न मन्त्रो से अर्थ विचारपूर्वक तीन आचमन करें। अब बाई हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से दाहिना हाथेली में उतना जल लेना चाहिए जितना कण्ठ से नीचे छति तक पहुंचे। उसेसे अधिक या कम नहीं लेना चाहिए।
इसको हाथ के बह्मतीर्थ से ग्रहण करना चाहिए। ग्रहण करते समये किसी भी तरह की शब्द नहीं होना चाहिए। 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥ १। इससे प्रथम।
ॐ अमृतापिधानमसि  स्वाहा २ । इससे दूसरा।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयातं  स्वाहा॥ ३।  इससे तीसरा।
इसके वाद दो वार अंगूठे के मूल से ओठों को पोछे , फिर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो डाले।
अंग स्पर्श मंत्र 
अब दाहिना हाथ से पञ्च पात्र से आचमनी के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर दाहिने हाथ अंगुलियों से जल के द्वारा स्पर्श करते हुए इन्द्रियों की स्थिरता एवं दृढ़ता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करे। 
ॐ वाङ् म आस्येऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अनामिका से मुख मे)
ॐ नसोर्मे प्राणऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठे से नासिका के दो छिद्र मे)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षरस्तु॥ (दाहिने हाथ की  मध्यमा और अंगुष्ठे से दोनों आँखों मे)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु॥ (दाहिने हाथ की  अनामिका और अंगुष्ठे से दोनों कानो मे)
ॐ बाह्वर्मे बलमस्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर दोनों भुजाओ मे)
ॐ उर्वोर्मे ओजोऽस्तु॥ (दाहिने हाथ की  पांच अंगुलियों को मिलकर जांघो मे)
ॐ अरिष्टानि मेङ्गानि तनुम्तन्वा मे सह सन्तु॥ (दाहिने हाथ की पांच अंगुलियों को मिलकर पूरा शरीर मे)
वाम हाथों का जल प्रक्षालन पात्र मैं डाल दैं। फिर दाहिना हाथ से आचमनी पात्र से चमास के माध्यम से बाई हाथेली में थोडा जल लेकर हाथ प्रक्षालन पात्र मैं धो लैं।
अग्नि-ज्वालन-मन्त्र 
ॐ भूर्भुवः स्वः 
इस मन्त्र का उच्चारण करके कपूर को अग्निपात्र मे रखकर उसमे छोटी छोटी लकड़ी लगाके यजमान उस पात्र को हाथों से उठाकर यदि गर्म होतो अग्निपात्र को चिमटे से पकड़कर खड़े हो कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे।
 भूर्भुवः॒ स्व᳕र्द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा । तस्या॑स्ते पृथिवी देवयजनि पृ॒ष्ठे᳕ऽग्निम॑न्ना॒दम॒न्नाद्या॒या द॑धे ॥ (यजु अ ३। म. ५)
इस मन्त्र से यज्ञकुण्ड के मध्य में अग्नि पात्र को रख कर , उसमे छोटी छोटी लकड़ी और कपूर अदि से अगला मन्त्र पढ़कर अग्नि को काष्ठ में प्रविष्ठ कराए।
ॐ ॐ उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि॒ त्वमि॑ष्टापू॒र्ते सᳬंसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ अध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत ॥(यजु अ १५ । म. ५४ )
समिदाधान मन्त्र 
जव अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे , तब आठ अङ्गुल की तीन समिधाये घृत में डुबाकर उनमे से नीचे लिखे मन्त्र से एक एक समिधा अग्नि में चढ़ावे। वे मन्त्र इस प्रकार है -
ॐ स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस से  प्रथम  (यजु अ ३।म. १)
ॐसुस॒मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये जातवेदसे (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस  से दूसरा  (यजु अ ३। म. २ )
ॐ तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृतेन॑ वर्द्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यवीष्ठ्य॒ स्वाहा॑ इदमग्नयेऽङ्गिरसे (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस  से  तीसरा (यजु अ ३। म.३)
पर्युक्षण मन्त्र 
अग्निकुण्ड के चारो और निम्न लिखित मन्त्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा में प्रणिता से जल लेकर प्रोक्षणी से जल सिंचन करे।
ॐ अदितेनुमन्यस्व ॥ इस मन्त्र से पूर्व में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ अनुमतेनुमन्यस्व॥ इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥  इस मन्त्र से  उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐ देव॑ सावितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः  के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।

निम्न लिखित मन्त्र से आज्यस्थाली में से स्रुवा को भरकर दाहिने हाथ की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से स्रुवा को पकड़कर पाञ्च घृताहुति दे। (यह जहाँ भी स्रुवा से आहुति दिया जायेगा सभी स्थानों में दाहिने हाथ की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से स्रुवा को पकड़कर आहुति दे ) 
ॐ अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ॥ इदमग्नये जातवेदसे (- न मम ) (-इदं न मम )
आधाराहुति 
 प्रजापतये  स्वाहा॥ इदं प्रजापतये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ (मौन  आहुति ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य दक्षिण में आहुति दे।  
ॐ इन्द्राय स्वाहा॥ इदं इन्द्राय (- न मम ) (-इदं न मम ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य उत्तर में  आहुति दे।  
(इस मंत्र से दोनों आधार को अग्नि के मध्य में पश्चिम से पूर्व की और सीधा रेखा में देना चाहिए। मध्य में आज्य की  धारा ना टूटनी चाहिए ना आपस में मिलाना चाहिए।)
आज्यभागहुति 
ॐ अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के उत्तर भाग की अग्नि में या आग्नेय कोण में आहुति दे।
ॐ सोमाय  स्वाहा॥ इदं सोमाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥  इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के दक्षिण भाग की अग्नि में या ईशान कोण में आहुति दे।
प्रातः कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः कालीन आहुतिया देवे। (अव यज्ञमान और उसके पत्नी को छोडकर वाकी सव व्यक्ति अखण्डित चावलों में घृत मिला हुआ तन्दुल पत्रों को लेकर दाहिना हाथो की अंगूठा, मध्यमा और अनामिका से अखण्डित चावलों को यज्ञकुण्ड में आहुति दे। यह प्रातः कालीन आहुतिया से  लेकर उभय कालीन प्रार्थना मंत्र आहुतिया तक दिया जाता है )
ॐ सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योतिः॒ सूर्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ ज्योतिः॒ सूर्यः॒ सूर्यो॒ ज्योतिः॒ स्वाहा॑॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जूरु॒षेसेन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णः सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहा॑॑क॥ इदं सूर्याय (- न मम ) (-इदं न मम )
सायं कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से सायं कालीन आहुतिया देवे 
ॐ अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑रग्निः॒ स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अग्निर्वर्चो योतिर्वर्चो स्वाहा  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑रग्निः॒ स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(मौन  आहुति )
ॐ स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा स॒जू रात्र्येन्द्र॑वत्या । जु॒षा॒णोऽअ॒ग्निर्वे॑तु॒ स्वाहा॑  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥

उभय कालीन आहुतिया 
निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः काल एवं सायं काल दोनों समय प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतियो के पश्चात आहुतिया देवे। यदि किसि कारण से एक ही समय यज्ञ करना हो तो प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतिया इकट्ठी देकर उभय कालीन आहुतिया देवे। वे इस प्रकार है। 
ॐ भूरग्नये प्राणाय स्वाहा  इदमग्नये प्राणाय(- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ भुवर्वायवेपानाय स्वाहा॥ इदं  वायवेपानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥इदमादित्याय व्यानाय (- न मम ) (-इदं न मम )॥
ॐ भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। २ )
ॐ आपो ज्योतिरसो मृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा  इदमद्भ्यो ज्योतिषे रसायामृताय ब्रह्मणे (- न मम ) (-इदं न मम )॥(तै. आ. १०। १५ )
उभय कालीन प्रार्थना मंत्र आहुतिया
पुनः निम्न लिखित मन्त्रो से प्रातः काल एवं सायं काल दोनों समय प्रातः कालीन,  सायं कालीन एवं उभय कालीन आहुतियो के पश्चात उभय कालीन प्रार्थना मंत्रो से आहुतिया देवे। यदि किसि कारण से एक ही समय यज्ञ करना हो तो प्रातः कालीन एवं सायं कालीन आहुतिया इकट्ठी देकर उभय कालीन आहुतिया और उभय कालीन प्रार्थना मंत्रो आहुतिया की देवे। वे इस प्रकार है। 
ॐ यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते । तया॒ माम॒द्य मे॒धायाऽग्ने॑  मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑  इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३२ ।म. १४ )
ॐ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव ।यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व॒ स्वाहा॑   इदं (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ३० ।म. ३ )
ॐ अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑रा॒येऽअ॒स्मान विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्य᳕स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम स्वाहा॑ इदमग्नये (- न मम ) (-इदं न मम )॥(यजु अ ४० ।म. १६ )
प्रजापत्याहुति मन्त्र 
 प्रजापतये  स्वाहा॥ इदं प्रजापतये (- न मम ) (-इदं न मम )॥ (मौन  आहुति ) इस मंत्र  से अग्नि के मध्य में आहुति दे।  

अनुपय्यक्ष्य मन्त्र 
अग्निकुण्ड के चारो और निम्न लिखित मन्त्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा में प्रणिता से जल लेकर प्रोक्षणी से जल सिंचन करे।
ॐ अदितेनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से पूर्व में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ अनुमतेनुमंस्थाः॥इस मन्त्र से पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की और।
ॐ सरस्वत्यनुमंस्थाः॥ इस मन्त्र से  उत्तर में पूर्व से पश्चिम की और।
ॐदेव॑ सावितः॒ प्रासा॑वी य॒ज्ञं प्रासा॑वी य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्य ग॑न्ध॒र्वः  के॑त॒पूः केत॑ न्नः पुनातु व॒चस्पति॒र्वाच॑ न्नः सदतु॑ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण में दक्षिणावर्तन से चारो और क्रिया करना चाहिए।
उस के वाद प्रदक्षिण द्वारा यज्ञकुण्ड के अग्नि को परिक्रमा ३ वार करे।
इस प्रकार अग्निहोत्र विधि या देवयज्ञ विधि समाप्त होता है।

Saturday, 1 July 2017

गृह वास्तु का ९ सूत्र

हम सभी जानते है की वास्तु विद्या भारतीय शिल्प शास्त्र का एक अङ्ग है । वास्तु विद्या भी अनेक प्रकार के है यथा गृह वास्तु, प्रसाद वास्तु, मन्दिर वास्तु, दूर्ग वास्तु, नाट्य शाला वास्तु, यान वास्तु इत्यादि । उसमे गृह वास्तु वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । जव हम गृह वास्तु का अध्ययन करते है तो हमे इससे आठ मुख्य सूत्र ओर एक गौण सूत्र प्राप्त होते है । यथा

  १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव । 
 २.  निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति ।
  ३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव ।
  ४.   गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण ।
 ५.  जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना ।
 ६.    भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव ।
  ७.   देश-काल-पात्र का परिगणन ।
  ८.    भूगोल के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

यह आठ मुख्य सूत्र है । और एक गौण सूत्र भी है ।

9.       ९. गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

प्रश्न उठता है कि जो गौण सूत्र है वह मुख्य सूत्र संख्या 8 का ही एक भाग है ! क्योकि खौगलिय ग्रहौं जो भूगल के उपर जव प्रभाव डालता है तो क्या वह गृह मे निवास करने वाले प्रतेक परिवार के सदर्स्य के उपर प्रभाव नहि डालते होगे ? अगर कहे कि प्रभाव डालता है तो अलग से सूत्र लिखने कि क्या जरुरत ? अगर यह कहे कि प्रभाव नहि डालता है तो गौण सूत्र लिखने कि क्या आवश्यकता ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है । भाव को स्पष्ट करने के लिये कभि कभि एक सूत्र को दो भाग मे वाटा जाता है । उसमे जो मुख्य प्रसङ्ग के साथ हो तो वह मुख्य सूत्र कहलाता है । ओर जो मुख्य प्रसङ्ग से अलग है वह गौण सूत्र कहलाता है । इसलिये अर्थ को स्पष्ट करने के लिये सूत्र संख्या 8 को दो भाग मे वाट कर दिया गेया है।

1) भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव अर्थात गृह और उसके भूगलिक स्थिति के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।
2) गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव ।

किन्तु पहला भाग मुख्य विषय के साथ सम्पक है इसलिये वह मुख्य सूत्र हूआ । और दूसरा भाग इस विषय से अलग है इसलिये वह गौण सूत्र हूआ ।

एक दूसरा प्रश्न उठता है कि सभी वास्तु मे उपयोग होता है ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि सभी वास्तु मे उपयोग नहिं होता है । प्रसङ्ग के अनुसार कुच्छ सूत्र कम या अधिक होता हैं । यह विषय प्रसङ्ग से अलग है इसलिये यहाँ हम उसको यहाँ विचार नहि करंगे । लेकिन फिर कभि हम इसका विचार करेङ्गे ।
अव चलते है का संक्षेप मे विचार करते है ।

 १.  परिवेश का गृह पर प्रभाव :- आज हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है हमे थोडा वहुत परिवेश का मन्युष्य के उपर क्या प्रभाव होता है यह हम सव जानते हैं । किन्तु परिवेश का गृह पर भी प्रभाव पडता है यह वहुत कम लोक ही जानते है । जैसे आच्छा परिवेश मे एक बालक का आच्छा स्वभाव और चरित्र बनता है । और खराव परिवेश मे एक बालक का स्वभाव और चरित्र खराव बनता है । उसि तरहा शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है । और कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । इसलिये हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है ।

पश्न उठता है कि जव हम 21वि शताव्द्धि मे रहते है, तो क्या प्राचिन वास्तुकार के मतों को मानना जरूरी है ? अगर मानना जरूरी है तो आज के युग के अनुसार इस का वैज्ञानिक व्याख्या होना चाहिए ?

उपर लिखा हुआ प्रश्न का उत्तर देते है कि पहले जो वास्तुकार होते थे वह उस समय का देश-काल-पात्र को लेकर पुस्तक लिखा करते थे । लेकिन आज के युग मे उस का १00% लागु करना कष्ट है । क्यूकि उस समय का देश-काल-पात्र अलग था और आज का देश-काल-पात्र अलग है । लेकिन जो नियम है वह स्वास्वत है । वह कभि देश-काल-पात्र के साथ परिवर्तन नहि होता । हमारा काम है की उस नियम को देश-काल-पात्र के अनुसार व्यवहार मे लाना ।

तो हम हमारे प्राचिन वास्तुकार ने मन्दिर के पाश, राज रास्ता इत्यादि के पाश गृह वनाना मना किया गेया है उस का वैज्ञानिक कारण है कि कोलाहल और अशान्त परिवेश मे गृह का वातावरण अशान्त और असुखमय लगता है । और शान्त और स्वच्छ परिवेश मे गृह का वातावरण शान्त और सुखमय लगता है ।

इस नियम को अगर आज के युग मे प्रयोग करेंग तो उस का व्याख्या इस प्रकार होगा किसि भि कोलाहल और अशान्त परिवेश जेसे मन्दिर के पाश, वस स्टाण्ड, रेल्व स्टेसन, विमान वन्दर, सिनिमा हल, कारखाना, आदि, राज रास्ता से अर्थात राष्ट का मुख्य रास्ता, राज्य का मुख्य रास्ता, रेल रास्ता आदि, कोलाहल परिवेश अर्थात वाजर, पाठशाल आदि, अशान्त परिवेश अर्थात शम्शान, चिकिच्छालय, आदि के पाश गृह वनाना मना है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

 निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति :- निर्माण क्षेत्र स्थल का भौतिक स्थिति का अर्थ है जहाँ हम गृह का निर्माण करते है उस निवास स्थान पर हम ज्यादा समय तक सुख सुविधा मै रहे पाएंगे । जैसे केसा है भूमि उर्वरता, रंग, गन्धादि का परिक्षण, भूमि ठोस हे कि नहि उस का परिक्षण, उस स्थान मे जल कि मात्र केसा है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्ष भर तापमान केसा रहता है उस का परिक्षण अर्थात थण्डा है या गरम, वहाँ किस प्रकार के जीव, वृक्ष और द्रव्य मिलता है उस का परिक्षण, उस स्थान का वर्षभर वायु का गति का परिक्षण इत्यादि ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे। 

३.  पञ्च महाभूतों का गृह पर प्रभाव :- पृथिवि, जल, वायु, अग्नि और आकाश इसको पञ्च महाभूत कहते है । इन पञ्च महाभूतों का गृह मे क्या प्रभाव होता है उस का परिक्षण । क्योकि इस का परिवार के आरोग्य के साथ सिधा सम्पर्क है । गृह मे यदि पञ्च महाभूतों का उच्चित सम्नवय रहेगा तो गृह मे निवास करने वालो का स्वस्थ ठिक रहेगा । इसलिए गृह मे उचित मात्रा मे वायु और सूर्य किरण आना चाहिए । 

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

४.  गृह निर्माण सौदर्य का परिरक्षण :- मानव हमेशा सुन्दरता का पूजा करते आया है और हमेशा करता रहेगा । मानव क्य़ा पशु-पक्षि-कीट-पतंग सभि सुन्दरता का पूजा करते है । तो मानव क्य़ो नहिं करेगा । क्यो कि हर सुन्दर वस्तु सभि को आनन्द देता है । और सभि चाहते है सुन्दर दिखन के लिए, सुन्दर द्रव्य पाने के लिए, सुन्दर गृह मे रहने के लेए । गृहादि को केसे सुन्दर वनाया जाये यह भि वास्तु विद्या का एक अङ्ग है । इसलिए गृह का आभन्तर और वाह्य दोनो सुन्दर होना चाहिए । जिसको देखकर मन प्रफल्ल हो जाए ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।  

 ५. जीवन कि आवश्यकता का गृह मे रूप परिकल्पना :- क्या आपने कभि मधुमक्षि के छाता को देखा है । मधुमक्षि जव अपनि छाता तयार करता है तव अपनि रहने के लिए, अपनि अण्डे के लिए, अपनि खाद्य के लिए, रानि मधुमक्षि के लिए इत्यादि अलग अलग शाला वनते है । तो मानव अपने आवश्यकता के अनुसार गृह मे शाला का परिकल्पना यथा स्नानागार, पाकशाला, शयनशाला, भजनशाला इत्यादि अलग अलग शालाएँ नहीं कर सकता। य़ह प्रत्यक परिवार के लिए और परिवार के सद्रस्य के रुचि के अनुसार अलग अलग शाला वनाया जाता है और कुच्छ कुच्छ शालाएँ सभि के लिए एक जेसा होता है।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे।

६.   भू भौतिक शक्ति का गृह पर प्रभाव :- हम सभि जानते है प्रत्यक पदार्थ मे कुच्छ शक्ति रहता है । उस तरहा हमारे पृथिवि और आकाशादि मे कुच्छ शक्तियां है । उस मे पृथिवि के शक्ति का परक्षण हम भूमि के उवरता के द्वारा जान सकते है । ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं को हम आयादि साधन ओर सही दिशा के द्वारा गृह को ऊजावान कर सकते है । उससे हम गृह मे पृथिवि के शक्ति ओर ब्रह्माण्डय ऊर्जाओं एकत्रित करके अपने जीवन को सफल कर सकते है ।

इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे । 

७.   देश-काल-पात्र का परिगणन :- जैसे सभि रोग के लिए एक औषधि नहि होता है । अलग अलग रोग के लिए अलग अलग औषधि होता है । उस तरहा वास्तु के नियम देश-काल-पात्र के अनुसार कुच्छ वदल जाता है । जैसे गृह शीतप्रधान देश मे अलग होता है और ग्रीष्मप्रधान देश मे अलग होता है यह देश के अनुसार उदाहरण हुआ। 200 साल पहले गृह निर्माण द्रव्य अलग होता था । और आज गृह निर्माण द्रव्य अलग है, यह काल के अनुसार उदाहरण हुआ । एक समान्य व्यक्ति के लिए गृह जैसे वनाया जाता है, एक धनि व्यक्ति के लिए उससे कहि सुन्दर वनाया जाता है यह पात्र के अनुसार उदाहरण हुआ ।

यह देश-काल-पात्र का संक्षेप परिगणन हुआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करंगे ।

८.   भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- भूमि पर जो कुच्छ शक्ति ऊत्पन होता है उसका प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क आकशिय ग्रहौं, नक्षत्रों आदि से है । इसको आधुनिक विज्ञान भी मानता है । समुन्द्र के लहरे पर्णिमा के दिन वडा होता है और अमावास्या के दिन छोटा होता है यह एक छोटा उदाहरण है भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं के प्रभाव का। पृथिवि के कहाँ कहाँ पर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है । सूर्य और अन्य ग्रहका विभिन्न राशिपर क्या प्रभाव पडता है ? सूर्य के गतिका वास्तु परुष के गति साथ क्या सम्पर्क है ? वास्तुपुरुष के सिर ऐशन्य कौण मे क्यों है ? ईत्यादि सव भूगोल के उपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव के भितर आता है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे । मनुष्यादि 

९.  गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर आकशिय ग्रहौं का प्रभाव :- जव भूमि पर ग्रहौं, नक्षत्रों आदि के प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है, तो भूमि पर निवास करने वाले जीव, मनुष्यादि पर भि प्रतक्ष या परोक्ष सम्पर्क होता है । एक छोटा उदाहरण कहता हूँ पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगियों का पागलपन वढ जाता है । इस से पता चलता है कि ग्रहौं, नक्षत्रों का मनुष्य के उपर सम्पर्क होता है । मनुष्य के उपर कोन से ग्रह का प्रभाव है और कोन कोन सा राशि का प्रभाव है वह हमारे ज्यतिष शास्त्र मे विस्तृत वर्णन है ।

यह सव संक्षेप मे विचार हूआ इस का विशृत वर्णन हम फिर कभि करेंगे ।

प्रश्न उठता है कि एक हि गृह का वास्तु एक होते हुए गृह मे निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य अलग अलग क्यो है ?

इस का उत्तर यह है कि मनुष्य का जीवन को अगर वैल गाडि मान लिया जाए । तो इस वैल गाडि का दो पहया है भाग्य और वास्तु । कर्म इस वैल गाडि का वाकि अन्श है । मन और बुद्धि इस गाडि का खिचने के लिए दो वैल है । और मनुष्य का आत्मा इस वैल गाडि का चालक । अगर सव कच्छु ठिक है तो गाडि आरम से चलता है । किन्तु दो पहयामें से एक पहया खराप हो जाए । या दो वैलमें से एक ठिक से काम ना करे । या गाडि का वाकि अंश खराप हो जाए तो चालक गाडि को ठिक से चला नहि पाता । इस प्रकार भाग्य, वास्तु, कर्म, मन और बुद्धि सव कुच्छ ठिक हे तो मनुष्य का जीवन आरम से कटता है । अगर इसमे से एक ठिक नहि है तौ मनुष्य जीवन का ईह लोक और पर लोक दोनो खराब हो जाता है । 

मेरा अगला ब्लॉग होगा वास्तु से ब्रह्म ज्ञान


Thursday, 15 June 2017

वास्तु और पुरुषार्थ चतुष्ठय

आजकाल वास्तु की चर्चा काफी ज्यादा हो रहा है। लोगो वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करना पसंद करते है। वास्तु की पुस्तक की पुस्तक दुकानो पर काफी ज्यादा उपलब्ध हो रहा है। गणमाध्यम चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक हो या समाचार पत्र वास्तु के ऊपर चर्चा हो रहा है। ऐसा लग रहा है हम वास्तु युग मे आ चुके है। 

प्रश्न उठता है वास्तु का अर्थ क्या है ? और उसका मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है ? मैने कुछ लोगों को पूछा वास्तु कहने से आप क्या समझ ते है ? उनका जो उत्तर था वो इस तरहा से था गृह के वस्तुओं को दिशा के अनुसार रखना या कोई दीवार को तोड़फोड़ करना या कोई यन्त्र दीवारों पर लगाना आदि को वास्तु कहते है। क्या सच्च मे इसको वास्तु कहते है ! इसको वास्तु नहीं कहते। हाँ इतना जरूर कहूँगा वास्तु के नाम ज्योतिषियों ने लोगो की मन मे भय की सृस्टि करके रुपया कमाने का अच्छा उपाय कर रखे है। जवतक हम वास्तु क्या है इसका सही जानकारी ना हो जाए और वास्तु का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, इसकी सही जानकारी ना हो जाए, तवतक हम इस वास्तु रूपी अन्धकूप मे पड़े रहेंगे।

वास्तु शब्द संस्कृत भाषा से आया है। संस्कृत भाषा मे वास्तु शब्द का अर्थ है वसन्ती प्राणीनो यत्र  अर्थात जहाँ प्राणि निवास करते है उसको वास्तु कहते है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार वास्तु शब्द इस तरह तैयार हुआ है, वस निवासे + वसेरगारे णिच्च (उणादि कोष १, ७० )। अर्थात वस धातु के सा णिच्च प्रत्यय से वास्तु शव्द का उत्त्पन होता है।

वास्तु शव्द का अर्थ अन्य पुस्तको मे किया लिखा है विचार करते है। हलायुध कोष के अनुसार वास्तु कहने से इस प्रकार लिखा है "वास्तु संक्षेपतो वक्ष्य गृहबे विघ्ननाशानं। ईशानकोणादरभ्य हयोका शीतिपदे त्यजेत्  " अर्थात वास्तु संक्षेप मे ईशान्यादि कोण से प्रारंभ होकर गृह निर्माण का वो कला है जो गृह का विघ्न - प्राकृतिक उत्पातो -उपद्रवो से वचता है। वास्तुविश्वकोष मे वास्तु का अर्थ है "यह ग्राम, पुर, द्रुग, पत्तन, पुरभेद, आवास भवन और निवास भूमि का वाचक है। " इसप्रकार अमरकोष वास्तु शब्द का अर्थ है " गृहरचना विच्छिन्न भूमे " अर्थात गृह रचना के लिये अविच्छन्न भूमि को वास्तु कहते है।

किन्तु मेरा मत है वास्तु एक ऐसा गाणितिक विज्ञान का प्रयोगात्मक रूप है, जो मन्युष्य को निवास स्थल मे त्रिविध दुःख अर्थात आध्यात्मिक दुःख, आधिभौतिक दुःख और आधिदैविक दुःख को निवारण के लिये और पुरुषार्थ चतुर्वर्ग अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त के लिये एक माध्यम है।

वास्तुशास्त्र को कुछ लोक स्थापत्य शास्त्र कहते है तो कुछ लोक शिल्प शास्त्र कहते है। मेरा मत है वास्तुशास्त्र को स्थापत्य शास्त्र तो कह सकते है किन्तु शिल्प शास्त्र नहीं कह सकते। क्युकि वास्तुशास्त्र शिल्प शास्त्र का एक अंग है। फिर कभी शिल्प शास्त्र क्या है इस का वर्णन करेंगे।

आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति जिसे इंग्लिश मे आर्किटेक्चर और प्राचीन भवन निर्माण पद्धति को वास्तुशास्त्र कहते है। यह दोनों एक जैसा होकर भी दो अलग अलग विषय है। आज की युग मे भवन निर्माण पद्धति के अनुसार कैसे उत्तम गृह का निर्माण किया जा सकता है वो किसि भी भवन निर्माणकरि (आर्किटेक्ट) कह सकता है, किन्तु वहा जो निवास करेगा वो आनंद मे रहेगा उसका प्रमाण दे नही सकता। किन्तु एक प्राचीन भवन निर्माणकरि (वास्तुशास्त्री ) कह सकता है की यहाँ जो निवास करेगा वो सुख मे रहे पायेगा या नहीं। यदि हम वास्तु शास्त्र का मूल सिद्धान्त को लेकर आधुनिक भवन निर्माण कला के मिलाकर भवन निर्माण करते है तो हम एक सुखी जीवन पा सकते है। और यदि हम भवन निर्माणकला से वास्तु विज्ञान को निकाल दिया जाये तो हम ईट, पथर, लोहा, सीमेन्ट आदि का एक सुव्यवस्थित सुंदर आकर वस्तु ही निर्माण होगा किन्तु उसे एक गृह के रूप मे विवेचिन नहीं हो पाएगा। कारण गृह किसीको कहते है उसका सुन्दर वर्णन
वृहदवास्तुमाला मे लिखा है।

स्त्रीपुत्रादिकभोगसौख्यजननं धर्मार्थाकामप्रदम्।
जन्तुनामयनं सुखास्पादमिदं शीतामवुघर्मापहम। (४ )

स्त्रीपुत्र आदि का भोग, सुख, धर्म, अर्थ, काम को प्रदान करनेवाला , प्राणियों को सुख का स्थान और शीत, वायु, गरम अदि कष्ट से रक्षा करने वाला गृह है।

संसारमे जितने भी प्राचीन मानव सभ्यताए है प्राय सभी गृह निर्माणको एक सांसारिक कृत्य के रूप मे मानते है किन्तु भारत मे गृह निर्माणको एक धार्मिक कृत्य के रूप मे मानते है। उस का क्या कारण है ? क्यूँ के हमारे ऋषियों का यह मानना है, जहा मनुष्य रहेगा वहा अपनी निवास स्थान पर पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करेगा। जब तक हम इस धार्मिक तत्त्वका मूल रहस्य विन्दु तत्त्वको नहीं समझ पायेंगे, तबतक हम वास्तुशास्त्र का मनुष्य जीवन के साथ क्या सम्पर्क है, हम ठीक से समझ नहीं पाएंगे।

अव प्रश्न उठता है पुरुषार्थ चतुष्ठयका वास्तु के साथ क्या सम्पर्क है ? उसका वर्णन हम यहाँ करेंगे।

१. धर्म :- धर्म क्या है ?
आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का प्रथम सूत्र मे लिखा है

सुखस्य मूलं धर्म : ।(चाणक्यसूत्र १। १ )

अर्थात किसी भी व्यक्ति या समाज का सुख का मूल धर्म है। तो धर्म क्या है ? संस्कृत मे धर्म की व्याख्या इस तरहा किया जाता है धरणात् धर्म इत्याहु : या ध्रीयते अनेने लोक : इत्यादि के अनुसार जिसे आत्मोन्नति और उत्तम सुख को धारण किया जाता है वह धर्म है अथवा जिसके द्वारा समस्त लोक को धारण किया जाता है अर्थात व्यवस्था या मर्यादा मे रखा जाता है वह धर्म है। हम इसको इस तरहा कह सकते है आत्माका उन्नति करने वाला, मोक्ष और उत्तम व्यावहारिक सुखों को देनेवाला आचरण, कर्त्तव्य, अथवा श्रेष्ठ विधान या नियम को धर्म कहते है। स्थूल रूप मे हम धर्म को दो भागो मे भाग किया जा सकता है।
i . मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थमे )
ii . गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे )

i. मुख्य अर्थ (आध्यात्मिक अर्थ मे) : आध्यात्मिक अर्थ मे आत्मा का उपकारक, मोक्षको प्राप्त करनेवाला आचरण को धर्म कहा जाता है।  यह धर्म का मुख्य अर्थ है।

ii. गौण अर्थ (लौकिक अर्थमे) : लौकिक अर्थमे या व्यावहारिक क्षेत्रमे मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति करने वाला, मानवत्व और देवत्व का विकास करने वाला, उत्तम सुख को प्रदान करने वाला और श्रेष्ठ व्यावहारिक कर्त्तव्य, मर्यादा और विधान को धर्म कहा जाता है। यह लौकिक अर्थ मे होने के कारण देश काल और परिस्थिति के अनुसार इस का अर्थ वदल जाता है।

तो धर्म के साथ वास्तु का संपर्क है ?

धर्म जिसका वर्णन हम उप्पर कर चुके है चाहे मुख्य रूप मे हो या गौण रूप मे प्रत्यक्ष्य या परोक्ष्य रूप मे गृह और समाज के ऊपर निर्भर करता है। इसको हम ऐसे कह सकते है वास्तु के ऊपर निर्भर करता है। जहाँ मनुष्यका आत्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति होने मे काफी सहायता मिलता है। इसलिए यदि गृह निर्माण के वाद कर्त्ता और उसके परिवार का उन्नति नहीं हुआ तो गृह निर्माण करने का क्या प्रयोजन ?

२. अर्थ :- प्रथम हम अर्थ क्या है यह समझते है।

आचार्य चाणक्य अपनी सूत्र ग्रंथ मे प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र मे लिखा है

धर्मस्य  मूलं  अर्थ :   (चाणक्यसूत्र १।२ )

अर्थात धर्म का मूल अर्थ है। यदि किसी व्यक्ति या समाज के पास अर्थ अर्थात धन नहीं है तो वो व्यक्ति या समाज धर्म का उपार्जन नहीं कर सकता। अर्थ का एक ही प्रमाण यहाँ लिख रहा हूँ, इसका कारण है की प्राय सभी धन के विषय मे परिचित है। पंचतन्त्र मे लिखा है

यस्यार्थास्तुस्य मित्राणि, यस्यार्थास्तुस्य बान्धवा : ।
यस्यार्था: स पुमाल्लोके, यस्यार्था: स च पण्डित : । (१ / ३ )

अर्थात धनवान पुरुषको सभी मित्रता करना चाहता है। धन अगर पास है तो परिवार और स्वजन लोगो आत्मीयता प्रदर्शन करते है। धनवान पुरुष समाज मे उत्तम पुरुष के रूप मे गणना होता है। और धन के द्वारा वो समाज मे विद्वान के रूप मे जाना जाता है।

इसतरहा बहुत सारे उदाहरण है किन्तु लिखना सिर्फ कागज भरनी की सामान है। इसलिए मे ज्यादा नहीं लिख रहा हू।

अगर किसी भी गृहस्थ उसका गृह निर्माण करने के वाद उसका परिवार का प्रत्येक व्यक्ति का अर्थ मे वृद्धि नहीं हुआ तो गृह निर्माण का क्या लाभ ? इसलिए गृह निर्माण करने के वाद गृहकर्त्ता का अर्थ मे वृद्धि होना अत्यंत आवश्यक है। यही वास्तु का अर्थ का साथ सम्पर्क है।

३. काम:- मे काम के वारे मे ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा। किन्तु इतना लिखूंगा यहाँ काम का मतलव यौन सुख से है।

गृह निर्माण के वाद गृहपति या गृहपत्नी को पूर्ण दाम्पत्य सुखका प्राप्त होना चाहिए। पुत्र -पौत्र आदि से गृह बृद्धि होना चाहिए। अगर गृह निर्माण के वाद परिवार मे कलह, मानसिक चिन्ता या परिवार मे सुख का अभाव होता है तो गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ काम का सम्पर्क है।

४. मोक्ष :-  महाराज मनु ने अपनी मनुस्मृति मे लिखा है

वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियणां च संयम : ।
धर्मक्रियात्मा चिन्ता च नि:श्रेयसकर परम ।

अर्थात वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इद्रिया संयम, धर्म का पालन, और परमात्मा का ज्ञान और ध्यान यह मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वोत्तम कर्म है।

इसलिए गृह निर्माण करने पर गृहपति और इसके परिवार को मृत्यु के वाद मोक्ष को और थोड़ा अग्रसर नहीं हुआ और परजन्म मे इस जन्म से अच्छा नहीं हुआ तो भी गृह का वास्तु सही नहीं है। यही वास्तु के साथ मोक्ष का सम्पर्क है।

इसतरहा मैने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संक्षप परिचय किया है फिर कभी में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तृत वर्णन करूँगा।

इसलिए एक समाज या व्यक्ति के लिए वास्तुशास्त्र का क्या लाभ उसका उत्तर विश्वकर्मावास्तुशास्त्र मे लिखा है।

शास्तेणानेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम् ।
चतुर्वर्गफल प्राप्तिस्सल्लोकश्च भवेद् ध्रुवम् ।। ( १ /३० )
शिल्पशास्त्र परिज्ञाना  न्यर्त्ये पी  सुरमं भवेत् । (१ / ३१ )

अर्थात समस्त लोकोमे विभिन्न शास्त्र का लख्य है, परम सुख को प्राप्त करना। इहलोकमे पुरुषार्थ चतुष्ठय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करना। और सत्यलोक मे अनंत काल तक आनंद मे रहना। इस शिल्पशास्त्र को जानने वाला इहकाल मे पृथिवी मे देवत्व को प्राप्त करने के कारण वो सम्पूर्ण समाज का कल्याण करने के लिए हमेशा उद्यम करता रहता है,  इसलिए वो भूलोक में  देवता तुल्य हो जाता है। मृत्यु के वाद उस शिल्पी का शिल्प उसको अमरत्व ले आता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. मनुस्मृति : मनु, भाष्यकार डॉ. सुरेन्द्रकुमार, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  2. पञ्चतन्त्र: श्रीविष्णुशर्मा प्रणीत, व्याख्याकार श्री श्यामचरण पाण्डेय, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, संस्करण २००६ ई।
  3. बृहद वास्तुमाला: श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी संस्करण २०१४ ई।
  4. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ भोजराज द्विवेदी, डाइमंड वूक्स, न्यू दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  5. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र : विश्वकर्मा, सम्पादक एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१० ई।
  6. कौटल्य अर्थशास्त्र : कौटल्य, सम्पादक एबं अनुवादक उदयवीर शास्त्री, मिहिरचन्द्र लक्षमण दास, दिल्ली। 
  7. उणादि कोष: पाणिनि , सम्पादक एबं अनुवादक दयानंद सरस्वती, रामलाल कपूर ट्रस्ट, सोनीपत, हरियाणा, संस्करण २०१० ई।

Monday, 15 May 2017

उपस्कारक ग्रंथ

इस ब्लॉग के हर एक पोस्ट मे मैने उपस्कारक ग्रंथ सूचि दे दिया है। मेरे वहुत सारे मित्र पूछ रहे है इस ब्लॉग के लिखने के लिए किस किस पुस्तक का सहायता लिया हूँ। मैने जिस जिस पुस्तक से अभी तक सहायता लिया हूँ, उसका सूची इसप्रकार है।  
  1. आयुर्वेदीय हितोपदेश : वैद्य रणजीत राय देसाई, श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्रा. लि., नागपुर, संस्करण २००५ ई।
  2. काश्यपीयकृषिपद्धति : कश्यप मुनि , व्यख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २०१३ ई। 
  3. गृहवास्तु प्रदीप : अज्ञात कृत, व्याख्याकार  डॉ. शैलजा पाण्डेय, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २०१० ई।
  4. गुहरत्नभूषण : श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, ज्योतिष प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २००९ ई। 
  5. ज्योतिष रत्नमाला: श्रीपति भट्टाचार्य,  डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २००४ ई।
  6. ज्यातिषवृतशतं : महेश्वरोपाध्याय कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८ ई।
  7. ज्यातिषसार : ज्योतिर्विद शुकदेव विरचित, टिककर पंडित केशव प्रसाद शर्मा द्विवेदी। संशोधक पंडित राधाकृष्ण मिश्र, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००५  ई।
  8. दीपिका वा शुद्ध दीपिका : महामहोपाध्याय श्रीनिवास प्रणीत कन्हेयालाल मिश्र टिका, खेमराज  श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००८ ई।
  9. देवालय चन्द्रिका : नारायण नम्बूदिरी, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं अनुभूति चौहान, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१५ ई।
  10. नारद संहिता :नारद मुनि, व्याख्याकार आचार्य रामजन्य मिश्र, चौखम्भा संस्कृत भवन, वाराणसी, संस्करण २०१५ ई।
  11. न्याय दर्शन :गौतम, अनुवादक ठाकुर उदय नारायण सिंह, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी,  संस्करण २०१५  ई।
  12. न्याय दर्शन :गौतम, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१७  ई।
  13. पञ्चतन्त्र: श्रीविष्णुशर्मा प्रणीत, व्याख्याकार श्री श्यामचरण पाण्डेय, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, संस्करण २००६ ई।
  14. प्रमाणमंजूरी : सूत्रधार मल्ल,सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू,चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००४  ई।
  15. ब्रह्मसूत्र : बादरायण, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  16. बृहद वास्तुमाला: श्री रामनिहोर द्विवेदी, संपादक डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी एबं डॉ. रवि शर्मा, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी संस्करण २०१४ ई। 
  17. बृहत शिल्पशास्त्र : दयानिधि खड़ीरत्न, धर्मग्रन्थ स्टोर, कटक, संस्करण २००२ ई। 
  18. मयमत: मयमुनि, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २००४  ई।
  19. मण्डपकुण्डसिद्धि : श्रीमद्विट्ठल दीक्षित कृत, व्यख्याकार आचार्य श्रीनिवास शर्मा, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००२ ई।
  20. मनुस्मृति : मनु, भाष्यकार डॉ. सुरेन्द्रकुमार, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  21. मर्म विज्ञान: पं रामरक्ष पाठक, चौखम्भा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  22. मुहूर्त चिंतामणि : श्रीरामाचार्य, व्याख्याकार महीधर शर्मा, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई , संस्करण २००८ ई।
  23. मानसार : मानसार, टिकाकार शेवप्रसाद वर्मा, स्थापत्य वेद शिक्षण एबं शोध संस्थान, इंदौर, संस्करण २००९ ई। 
  24. मनुष्यालय चन्द्रिका : नारायण नम्बूदिरी, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २०१३ ई। अंग्रजी मे इंजीनियरिंग टिका , डॉ. ए अच्युतन तथा डॉ बालगोपाल टी एस प्रभु , वास्तुविद्या प्रतिस्थानम , कालीकट, संस्करण १९९८ ई।  
  25. मुहूर्त दीपक : श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  26. योगयात्रा : वराहमिहिर, ब्याख्याकार डॉ.  सत्येन्द मिश्र, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २०१० ई।
  27. योगदर्शन : पतंजलि, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१५  ई। 
  28.  राजमार्तण्ड : राज भोज, व्यख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू , चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८  ई।
  29. विसर्ग से सृस्टि की उत्पत्ति ( प्रत्यक्ष शारीर विज्ञान): डॉ. हीरालाल शर्मा और डॉ सुधा शर्मा, चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  30. विश्ववल्लभ - वृक्षायुर्वेद: चक्रपाणि मिश्र , सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००४ ई।
  31. वास्तुरत्नावली : श्रीजीवनाथ झा, टीकाकार श्रीमदच्युतानन्द झा , चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण  १९८१ ई। 
  32. वास्तुरत्नाकर : श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१२  ई। 
  33. वृक्षायुर्वेद: सुरपाल, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २००४  ई। 
  34. वृहत्संहिता : वराहमिहिर, सम्पादका एबं ब्याख्याकार डॉ.  सुरकान्त झा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१२ ई। 
  35. वस्तुराजबल्लभ : श्रीमंडन सूत्रधार  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई। 
  36. वास्तुकल्पलता : डॉ. हरिहर त्रिवेदी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७ ई।
  37. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र : विश्वकर्मा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१० ई। 
  38. विश्वकर्मा विद्याप्रकाश: रविदत्त शास्त्री, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २०१६  ई। 
  39. वास्तु एबं शिला चयन : डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू , न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००५ ई। 
  40. वास्तु सौख्य : श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला , संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी,  संस्करण २०१० ई। 
  41. वास्तु उद्धार धोरणी : सूत्रधार गोविंद, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००८ ई।
  42. वास्तुसारमण्डन एबं आयतत्त्व : श्रीमंडन सूत्रधार, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, न्यू भारतीय बुक कारपोरेशन, दिल्ली, संस्करण २००५ ई।
  43. वास्तुविद्या : अज्ञात कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००९  ई।
  44. वास्तुमंजरी : सूत्रधार नाथ कृत, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी, संस्करण २०१४  ई।
  45. विश्वकर्मा प्रकाश : विश्वकर्मा  खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २०१४  ई।
  46. वास्तु सारणी :श्री श्री मातृप्रसाद पाण्डेय, मास्टर खेलाडी लाल संकटा प्रसाद, वारणशी, संस्करण २०१३  ई।
  47. वैशेषिक दर्शन : कणाद, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  48. शिल्पशास्त्र :बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  49. शिल्प दीपक : श्रीगंगाधर, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००५  ई।
  50. शिल्प शास्त्रे आयुर्वेद : भूलोकमल सोमेश्वर,सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००८ ई।
  51. सकलाधिकार : अगस्त्य मुनि, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  52. सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र : डॉ  निमाई वानारजी, रामचंद्र दास, ज्ञानजूग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर।
  53. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ भोजराज द्विवेदी, डाइमंड वूक्स, न्यू दिल्ली, संस्करण २०१४ ई।
  54. समरांगणसूत्रधार : महाराजा भोज, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू  एबं प्रो  भवर शर्मा, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण  २०११ ई।
  55. सांख्यदर्शन : कपिल, व्याख्याकार उदयवीर शास्त्री, विजयकुमार गोविन्द राम  हासानंदा, दिल्ली, संस्करण २०१५ ई।
  56. Fabric of the Universe: the orignins, implications, andapplication of vastu science, by Jessie J. mercay, Dakshinaa publishing house, chennai, editions 2008. 
  57. Time = Space raguram Gopalan, http:/ragsgopalan.blogspot.com, editions 2012. 
  58. Aintiram : Maya Editor & Translator Dr. S. P. Sabharathnam,  Vaastu Vedic Research  Foundation, Chennai , editions 1997.  

Monday, 8 May 2017

गृहारम्भ तिथि,पक्ष और वार विचार

पक्ष के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

अब हम पक्ष के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।  

हम सभी जानते है चंद्र मास मे दो पक्ष होता है।
प्रथम शुक्ल पक्ष
और दूसरा कृष्ण पक्ष।

वास्तुगोपाल का लेखक के अनुसार और देवीपुराण का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष मे गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु कृष्ण पक्ष मे गृहरम्भ का फल चौरभय होता है। परन्तु राजमार्ताण्ड के लेखक राजा भोज के अनुसार शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण इस प्रकार है शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा निर्वल होता है। इस कारण गृहरम्भ का फल अशुभ होता है। उसी प्रकार शुक्ल पक्ष पञ्चमी से सप्तमी पर्यन्त चन्द्रमा हीनवली होता है। और शुक्ल पक्ष अष्टमी से दशमी पर्यन्त चन्द्रमा मध्यवली होता है। और शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। किन्तु नारद संहिता का लेखक के अनुसार शुक्ल पक्ष  के एकादशी से पूर्णिमा पर्यन्त और कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ का फल शुभ होता है। उसका कारण यह है की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त चन्द्रमा वलबान होता है। इसीकारण कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त गृहरम्भ हो सकता है।

तिथि के अनुसार गृहारम्भ फल विचार 

हम सभी जानते है चंद्र मास मे ३० दिन होता है। उसमे कृष्ण पक्ष का १५ दिन और शुक्ल पक्ष का १५ दिन।

कृष्ण पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी १५. अमावस्या। 

शुक्ल पक्ष का १५ दिन यथा १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४ .चतुर्थी, ५. पञ्चमी,  ६ .षष्ठी,  ७. सप्तमी, ८. अष्ठमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी, १५. पूर्णिमा।

अब हम तिथि के अनुसार गृहारम्भ का फल विचार करेंगे।

१. प्रतिपदा : शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण करने से दुःख को प्राप्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से दरिद्रता को प्राप्त होता हैं। किन्तु वस्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

२. द्वितीया: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार द्वितीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। किन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वितीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

३. तृतीया : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न अनुसार तृतीया तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष तृतीया तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल तृतीया तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

४. चतुर्थी : वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्थी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। परन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। 

५. पञ्चमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पञ्चमी तिथि में गृह निर्माण करने से चित्तचांचल्य होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष पञ्चमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल पञ्चमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

६. षष्ठीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार षष्ठी तिथि में गृह निर्माण करने से धननाश होता हैं। वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।

७. सप्तमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार सप्तमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष सप्तमी तिथि में पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल सप्तमी तिथि में पश्चिमद्वार का गृह निषेद्ध हैं

८. अष्ठमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अष्ठमी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से उच्चाटन होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से, इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से उद्वास होता है।  

९. नवमी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार नवमी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से धान्य का नाश होता हैं। वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं।

१०. दशमीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार दशमी तिथि में गृह निर्माण करने से चौरभय रहता हैं। किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष दशमी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल दशमी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

११. एकादशीशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार एकादशी तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल एकादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं 

१२. द्वादशीवास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार द्वादशी तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल द्वादशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१३. त्रयोदशी :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार त्रयोदशी तिथि में गृह निर्माण करने से प्रशस्त होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि में उत्तरद्वार का गृह निषेद्ध हैं और शुक्ल त्रयोदशी तिथि में दक्षिणद्वार का गृह निषेद्ध हैं

१४. चतुर्दशी: वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार चतुर्दशी तिथि में गृह निर्माण करने से अमंगल होता हैं। ज्योतिष रत्नमाला के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शस्त्राघात होता हैं। परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से स्त्रीविनाश होता है।  

१५. अमावस्या :वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार अमावस्या तिथि में गृह निर्माण करने से गृहस्वामी का नाश होता हैं। किन्तु वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी और वास्तुसौख्य के लेखक श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय होता हैं।किन्तु शिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से स्थाननाश  होता हैं।वास्तुकल्पलता के लेखक ने अपनी पुस्तक मे भृगु मत के हिसाब, से इस तिथि में गृह निर्माण करने से अशुभ होता हैं।   

१६. पूर्णिमाशिल्पशास्त्र के लेखक बाउरी महाराणा और वृहत शिल्पशास्त्र के लेखक दयानिधि खड़ीरत्न के अनुसार पूर्णिमा तिथि में गृह निर्माण करने से राजभय रहता हैं।किन्तु वास्तुराजवल्लभ के लेखक मण्डन मिश्र और वास्तुरत्नाकर के लेखक श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस तिथि में गृह निर्माण करने से शुभ होता हैं।  परन्तु वास्तुसौख्य के लेखक के श्री टोडरमल्ल के अनुसार इस तिथि मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है किन्तु पूर्वद्वार का गृह निषेद्ध हैं।

वार के अनुसार गृहारम्भ फल विचार
अब हम वार के अनुसार गृहरम्भ का फल विचार करेंगे।

हम सभी जानते है ज्योतिष शास्त्र मे वार सात है।
१. रविवार
२. सोमवार
३. मंगलवार
४. बुधवार
५. गुरुवार
६. शुक्रवार
और ७. शनिवार  

१. रविवार: शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार रविवार के दिन गृह निर्माण करने से अग्नि का भय रहता है। इस मत का समर्थन राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक करता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है।

२. सोमवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार सोमवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक करता है। किन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से अर्थलाभ होता है। परन्तु बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ किन्तु  गृह मे कलह और द्ररिदता लगी रहता है।

३. मंगलवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार मंगलवार के दिन गृह निर्माण करने से गृह मे वज्रपात होता है। किन्तु देवी पुराण का लेखक के अनुसार और दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना अशुभ होता है। परन्तु राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से क्षति होता है। और बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करना मृत्यु का भय लगा रहता है।

४. बुधवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार बुधवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

५. गुरुवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार गुरुवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

६. शुक्रवारशिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शुक्रवार के दिन गृह निर्माण करने से प्रशस्त्र होता है। वास्तुरत्नावली के लेखक ने ज्योतिषरत्नावली के नाम से लिखा है की इस वार मे गृह निर्माण करना शुभ होता है। इस मत का समर्थन दीपिका का लेखक, मुहूर्तदीपक का लेखक,  राजमार्तंड का लेखक राजा भोज और दीपिका का लेखक करता है।

७. शनिवार:  शिल्पशास्त्र का लेखक बाउरी महाराणा के अनुसार शनिवार के दिन गृह निर्माण करने से धन का क्षय और शोक होता है। किन्तु दीपिका का लेखक के अनुसार इस वार को गृह निर्माण करने से अशुभ होता है। परन्तु मुहूर्तदीपक का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से शुभ होता है। बृहत शिल्प शास्त्र का लेखक के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करनें से गृह स्वामी शोकातुर रहता है। और राजमार्तंड का लेखक राजा भोज के अनुसार इस वार मे गृह निर्माण करने से भय रहता है।
उपस्कारक ग्रंथ
  1. दीपिका वा शुद्ध दीपिका : महामहोपाध्याय श्रीनिवास प्रणीत कन्हेयालाल मिश्र टिका, खेमराज  श्रीकृष्णदास, मुंबई, संस्करण २००८ ई।
  2. मुहूर्त दीपक : श्रीमहादेव भट्ट, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २००६  ई।
  3. वास्तुरत्नावली : श्रीजीवनाथ झा, टीकाकार श्रीमदच्युतानन्द झा , चौखम्बा अमरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण  १९८१ ई। 
  4. बृहत शिल्पशास्त्र : दयानिधि खड़ीरत्न, धर्मग्रन्थ स्टोर, कटक, संस्करण २००२ ई।
  5. सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र : डॉ. निमाई बेनर्जी और रमेशचंद्र दाश, ज्ञानयुग पब्लिकेशन, भुबनेश्वर, संस्करण २०१४ ई।
  6. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा कृत, सम्पादक एबं व्याख्याकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगुनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, संस्करण २००६ ई।
  7. शिल्पशास्त्र : बाउरी महाराणा, सम्पादका एबं अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस , वाराणसी संस्करण २००६ ई।
  8. वस्तुराजबल्लभ : श्रीमंडन सूत्रधार,  रामयत्न ओझा, मास्टर खिलाडी लाल, वाराणसी, संस्करण १९९६ ई। 
  9. वास्तुरत्नाकर : श्री विन्ध्यास्वारी प्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, संस्करण २०१२ ई।
  10. वास्तु सौख्य : श्री टोडरमल्ल, सम्पादका एबं ब्याख्याकार: श्री कमला कांत शुकला, संपूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वारणशी, संस्करण २०१० ई। 
  11. वास्तुकल्पलता : डॉ. हरिहर त्रिवेदी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वारणशी, संस्करण २००७  ई।

Shiva Temple: Material & Practical Lessons (Adhibhautik)

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